द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
विश्वामित्रो जमदग्निर्भारद्वाजोऽथ गौतमः |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
विश्वामित्रो जहारैव कृतवुद्धिः श्वजाघनीम् ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
विश्वामित्रो भरद्वाजो जमदग्निस्तथैव च |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
विश्वामित्रो व्राह्मणत्वे लुव्धः कामपराय़णः ||
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
विश्वामित्रोऽथ तं दृष्ट्वा गालवं चाध्वनि स्थितम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
विश्वामित्रोऽथ भगवान्महर्षिरनिकेतनः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
विश्वामित्रोऽथ सम्भ्रान्तः श्रपय़ामास वै चरुम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
विश्वामित्रोऽपि भगवांस्तपसा दग्धकिल्विषः |
९१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
विश्वामित्रोऽप्यपक्रामत्तस्माद्देशादरिन्दम ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वामित्रोऽभ्यगाद्यत्र व्राह्मणत्वं तपोधनः ||
९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वामित्रोऽव्रवीत्क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय़ ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वामित्रोऽसितश्चैव जनकश्च महीपतिः |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
विश्वामित्रोऽहमित्येव सहसा तमुवाच सः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वामित्रोऽय़जद्यत्र शक्रेण सह कौशिकः |
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
विश्वावती चाकृतिरिष्टिरिद्धा; गङ्गोक्षितानां भुवनस्य पन्थाः ||
९० ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुप्रभृतिभिर्गन्धर्वैः स्तुतिवन्दनैः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुमुखास्तत्र गन्धर्वास्तपसान्विताः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुर्नारदपर्वतौ च; गन्धर्वमुख्याश्च सहाप्सरोभिः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
विश्वावसुर्नारदश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुर्भुमन्युश्च सुचन्द्रो दशमस्तथा ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
विश्वावसुर्विश्वमूर्तिर्विश्वेशो; विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुश्च गन्धर्वः शुभाश्चाप्सरसां गणाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
विश्वावसुश्च गन्धर्वः सिद्धाश्चाप्सरसां गणाः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा तुम्वुरुनारदौ |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा नारदपर्वतौ |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुश्च भानुश्च सुचन्द्रो दशमस्तथा |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुश्च ये चान्ये तेऽप्युपासन्तु वः सदा ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
विश्वावसुस्ततो राजन्वेदान्तज्ञानकोविदः |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसुस्तुम्वुरुश्च चित्रसेनश्च भारत ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
विश्वावसुहिरण्याक्षपुरुहूतनमस्कृत |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वावसोश्च तनय़ाद्गीतं नृत्तं च साम च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
विश्वावसोश्च मे पुत्रश्चित्रसेनोऽभवत्सखा |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
विश्वावासं निर्गुणं वासुदेवं; सङ्कर्षणं जीवभूतं वदन्ति |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
विश्वाविश्वं तथाश्वाश्वं मित्रं वरुणमेव च |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
विश्वाविश्वपरो भावश्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
विश्वाविश्वेति यदिदं गन्धर्वेन्द्रानुपृच्छसि |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
विश्वाव्यक्तं परं विद्याद्भूतभव्यभय़ङ्करम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
विश्वासं चात्र गच्छन्ति सर्वभूतानि भारत |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
विश्वासं समय़घ्नानां न यूय़ं गन्तुमर्हथ ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
विश्वासनार्थं वर्णानां सर्वेषामविशेषतः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
वृहस्पतिरु उवाच
विश्वासमोष्ठसन्दंशं शिरसश्च प्रकम्पनम् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
विश्वासस्ते भवेत्तत्र यथा पितरि वै तथा ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जाय़ति दुर्मतिः ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वासात्ते प्रवक्ष्यामि सन्तानाय़ कुलस्य च |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
विश्वासादुषिता पूर्वं नेदानीं विश्वसाम्यहम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
युधिष्ठिर उवाच
विश्वासाद्धि परं राज्ञो राजन्नुत्पद्यते भय़म् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
विश्वासाद्भय़मुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ||
१३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
विश्वासाद्भय़मुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
विश्वासाद्वध्यते वालस्तस्माच्छ्रेय़ो ह्यदर्शनम् ||
३४ ख