chevron_left  विषण्णवदनश्चापिarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
विषण्णवदनश्चापि युय़ुधानोऽभवन्नृप |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
विषण्णवदना भूत्वा पर्यपृच्छन्त ते सुतम् ||
३७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
विषण्णवदनाः सर्वे परिगृह्य धनञ्जय़म् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
विषण्णश्चाव्रवीद्रामं पश्यावस्थामिमां मम ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
विषण्णा पाण्डुसङ्काशा समपद्यत भारत ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
विषण्णा व्यथिताः खिन्ना निराशा जीविते भृशम् ||
४३ ख
मौसल पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विषण्णा हतसङ्कल्पाः पाण्डवाः समुपाविशन् ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
विषण्णाः कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादय़ः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
विषण्णानां मोक्षणं पीडितानां; क्षात्रे धर्मे विद्यते पार्थिवानाम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
विषण्णास्तव सोदर्यास्त्वय़ि प्राय़ं समास्थिते |
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
विषमं च समं चैव हतैरश्वपदातिभिः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
विषमं नाववुध्यन्ते प्रपातं मधुदर्शिनः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
विषमं पर्वतप्रस्थैरश्मभिश्च समावृतम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
विषमं पश्यते राजा सर्वथा तमसावृतः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
विषमं शकुनेश्चैव तव चैव विशां पते ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
वृहदश्व उवाच
विषमग्निं जलं रज्जुमास्थास्ये तव कारणात् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
विषमग्निं प्रपातं वा पर्वताग्रादहं वृणे |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
विषमच्छेदरचितैरनुलिप्तमिवाङ्गुलैः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
विषमस्थं जनं स्वं च चक्षुर्ध्यानेन रक्षति ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
विषमस्थं हि राजानं शत्रवः परिपन्थिनः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
विषमस्थः शरीरेषु स मृत्युः प्राणिनामिह |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
विषमस्थः शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह |
९३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
विषमस्थस्ततो राजा भविष्यति युधिष्ठिरः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
विषमस्थान्समस्थो हि संरम्भाद्गतचेतसः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
विषमस्थो ह्ययं जन्तुः कृत्यं चास्य महन्मय़ा ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
विषमां च दशां प्राप्य देवान्गर्हति वै भृशम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
पितामह उवाच
विषमाण्यपि ते प्राप्तास्तरिष्यन्ति न संशय़ः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
विषमालोड्य पास्यामि मा कीचकवशं गमम् |
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
विषमुद्वन्धनं दाहो दस्युहस्तात्तथा वधः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
विषमुद्वन्धनं वापि शस्त्रमग्निप्रवेशनम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
विषमेतत्समालोड्य कुम्भेन प्राशितं त्वय़ा ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
विषमौदुम्वरं शङ्खः स्वर्णं नाभिश्च रोचना ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
विषवन्तो महारोषा नागाश्चार्जुनतोऽभवन् ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
विषस्येवोद्विजेन्नित्यं संमानस्य विचक्षणः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
विषहन्ति सदा कर्तुमधिज्यान्यपि कौरव |
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
विषहेरन्भय़ामर्षौ क्षुत्पिपासे मदोद्भवौ |
११ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
विषहेरन्महाय़ुद्धे कृतं ते तन्महाद्भुतम् ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
विषह्यं चेन्मय़ा कर्तुं कृतमेव निवोध तत् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
विषह्यं यं हि यो मेने स स तेन समेय़िवान् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
विषह्यमेतदस्माकमतो राजन्व्रवीमि ते ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
विषाग्निज्वलनप्रख्यैरिषुभिः कृष्णपाण्डवौ ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
कर्ण उवाच
विषाग्निद्यूतसङ्क्लेशान्वनवासं च पाण्डवाः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
सौदास उवाच
विषाग्निश्वापदेभ्यश्च भय़ं जातु न विद्यते ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय ५६
विदुर उवाच
विषाणं गौरिव मदात्स्वय़मारुजते वलात् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
विषाणपोत्रापरगात्रघातिना; गजेन हन्तुं शकुनेः कुणिन्दजः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विषाणलग्नैश्चाप्यन्ये परिपेतुर्विभीषणाः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
विषाणाभिहताश्चापि केचित्तत्र गजा गजैः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
विषाणाभिहतास्ते च भ्राजन्ते द्विरदा यथा ||
१२ ख