chevron_left  विष्णुंarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
विष्णुं त्रिभुवनश्रेष्ठं पूजय़ामास धर्मवित् ||
४१ ग
वन पर्व
अध्याय २६०
व्रह्मो उवाच
विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स कर्मैतत्करिष्यति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
विष्णुः सहस्रशीर्षश्च देवोऽचिन्त्यः समागमत् ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
विष्णुक्रान्तेषु लोकेषु देवराजे शतक्रतौ ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
विष्णुधन्वा कुमारश्च परिवर्हो हरिस्तथा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
विष्णुना च वरो दत्तो मम पूर्वं ततो वधे |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
विष्णुना तु तदाकाशे वैनतेय़ः समेय़िवान् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
विष्णुना निहतेष्वेव दानवेय़ेषु देवताः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
विष्णुना यत्र पुत्रार्थे तपस्तप्तं महात्मना |
७ क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ९९
लोमश उवाच
विष्णुनाप्याय़ितं शक्रं दृष्ट्वा देवगणास्ततः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णुनाश्वशिरः प्राप्य तथादित्यां निवत्स्यता |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
विष्णुप्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
विष्णुभक्त्या हि तेनेदं जगद्व्याप्तमभूत्पुरा |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
विष्णुमव्यक्तसंस्थानं विशन्ते देवसत्तमम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
विष्णुमासीनमभ्येत्य व्रह्माणं चेदमव्रुवन् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
भीष्म उवाच
विष्णुमेवाभिजानन्ति सर्वय़ज्ञेषु व्राह्मणाः |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
विष्णुमेवाव्रवीदेनं भवानेव ददात्विति ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
विष्णुरङ्गिरसे प्रादादङ्गिरा मुनिसत्तमः |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४०
व्रह्मो उवाच
विष्णुरेवादिसर्गेषु स्वय़म्भूर्भवति प्रभुः ||
८ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णुर्ददौ वैजय़न्तीं मालां वलविवर्धिनीम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
विष्णुर्नामेह योऽग्निस्तु धृतिमान्नाम सोऽङ्गिराः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णुर्मरीचय़े प्रादान्मरीचिर्भगवांश्च तम् |
६५ क
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधामिमाम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
विष्णुर्वाराहरूपेण पूर्वं यत्र स्थितोऽभवत् |
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
विष्णुर्वाय़ुश्च शक्रश्च धर्मस्तौ चाश्विनावुभौ |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
विष्णुर्विक्रमणादेव जय़नाज्जिष्णुरुच्यते |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
विष्णुर्वै पीततां याति चतुर्धा वेद एव च ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
विष्णुवीर्यसमौ वीर्ये तथा भवसमौ युधि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
विष्णुश्च भगवान्देवः सर्वलोकाभिपूजितः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
विष्णुश्चात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः |
८५ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णुस्त्वमसि दुर्धर्ष त्वं यज्ञो मधुसूदन |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णो समवसन्नानां गिरिदुर्गे सुदारुणे |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
इन्द्र उवाच
विष्णोः क्षय़मुपागम्य समेत्य च महात्मना |
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
विष्णोः पुरुषकारेण पातालशय़नः कृतः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
विष्णोः सकाशात्सम्प्राप्य सम्भ्रमे तुमुले सति ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
विष्णोः समीपमागम्य पादौ शिष्यवदस्पृशत् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २६०
मार्कण्डेय़ उवाच
विष्णोः सहाय़ानृक्षीषु वानरीषु च सर्वशः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
विष्णोः स्वसानन्दिकरः स विष्ण्वाय़ुधभूषितः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
वृत्र उवाच
विष्णोरनन्तस्य सनातनं त; त्स्थानं सर्गा यत्र सर्वे प्रवृत्ताः |
५७ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
विष्णोर्दुर्वाससा यत्र वरो दत्तो युधिष्ठिर ||
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभय़ापहम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
विष्णोर्निःश्वासवातोऽय़ं यदा वेगसमीरितः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
विष्णोर्माहात्म्यसंय़ुक्तं दानवेन्द्राय़ धीमते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
विष्णोर्ललाटात्कमलं सौवर्णमभवत्तदा |
१३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
विष्णोश्चक्रं च तद्घोरं वज्रमाखण्डलस्य च |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
विष्णौ जगत्स्थितं सर्वमिति विद्धि परन्तप ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
विष्वक्सेन कुरून्गत्वा भारताञ्शमय़ेः प्रभो |
९० क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
विष्वक्सेनं तु निर्भिन्नं प्रेक्ष्य पार्थो धनञ्जय़ः |
१६ क