द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
विष्वक्सेनो यस्य यन्ता योद्धा चैव धनञ्जय़ः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
विष्वगश्वः पृथोः पुत्रस्तस्मादार्द्रस्तु जज्ञिवान् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
विष्वग्वातहता रुग्णा नौरिवासीन्महार्णवे |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
विष्वग्वाताः प्रादुरासन्नीचैः शर्करवर्षिणः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
विष्वग्वाताः सनिर्घाता रूक्षाः शर्करवर्षिणः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
विष्वग्वाताभिसम्भग्ना वहुशाखा इव द्रुमाः ||
१०२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
विष्वग्वाताश्च वान्त्युग्रा नीचैः शर्करकर्षिणः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
विष्वग्वाताश्च वान्त्युग्रा रजो न व्युपशाम्यति ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
विषय़ं नाधिगच्छामि विचिन्वन्पृथिवीमिमाम् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
विषय़ं मत्स्यराजस्य सुसमृद्धं सुसंहताः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
विषय़प्रतिसंहारमुभावेव प्रचक्रतुः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
विषय़प्रतिसंहारो मितजल्पस्तथा शमः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
विषय़श्च प्रभावश्च तुल्यमेवाभ्यवर्तत ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
विषय़स्थानि सर्वाणि वर्तमानानि भागशः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
विषय़ा विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
विषय़ा विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
विषय़ांश्च निगृह्णन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
विषय़ांश्च प्रजेशानां व्रह्मणो विषय़ांस्तथा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
विषय़ाः पञ्च चैकं च विकारे षोडशं मनः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
विषय़ाणां च दौरात्म्यं विज्ञाय़ नृपते पुनः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
विषय़ात्प्रतिसंहारः साङ्ख्यानां सिद्धिलक्षणम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
विषय़ानतुलान्भुङ्क्षे तेनासि हरिणः कृशः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
विषय़ानश्नुते यस्तु न स भोक्ष्यत्यसंशय़म् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
विषय़ानुसारिणी जिह्वा कर्षत्येव रसान्प्रति ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
विषय़ानेवमस्माभिर्दर्शितानभिमन्यसे |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
विषय़ानौरगाञ्ज्ञात्वा गान्धर्वविषय़ांस्तथा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
विषय़ान्ते कुणिन्दानामीश्वरः प्रीतिपूर्वकम् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
विषय़ान्ते ततो वीरा दंशिताः पर्यवारय़न् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
विषय़ान्ते सहामात्यः प्रत्यगृह्णात्सुसत्कृतम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
विषय़ान्परिरक्षन्तो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
विषय़ान्प्रतिसंहृत्य संन्यासं कुरुते यतिः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
विषय़ाश्चैव कार्त्स्न्येन सर्व आहारसिद्धय़े |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
विषय़ाय़तनस्थेन भूतात्मा क्षेत्रनिःसृतः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
विषय़ी पुरुषो नित्यं सत्त्वं च विषय़ः स्मृतः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
विषय़े काशिराजस्य ग्रामान्निष्क्रम्य लुव्धकः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
विषय़े दानरुचय़ो नरा यस्य स पार्थिवः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
विषय़े नित्यमुद्विग्नाः कुराजानमुपाश्रिताः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
विषय़े भूमिपालस्य तस्य धर्मः सनातनः ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
विषय़े मे न वस्तव्यमिति शिष्ट्यर्थमव्रवीत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
विषय़े लोमपादस्य यश्चकाराद्भुतं महत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
विषय़े वर्तमानानां यं तं वैशेषिकैर्गुणैः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
विषय़े वर्तमानानां या प्रीतिरुपजाय़ते |
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
विषय़े वर्तमानोऽपि न स पापेन युज्यते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
भीष्म उवाच
विषय़े सति वक्ष्यामि समर्थां मन्यसे च माम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
विषय़ेन्द्रिय़संय़ोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
विषय़ेभ्यो नमस्कुर्याद्विषय़ान्न च भावय़ेत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
विषय़ेषु च संसर्गाच्छाश्वतस्य च दर्शनात् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
विषय़ेषु च संसर्गाच्छाश्वतस्य नसंश्रय़ात् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
विषय़ेषु निमग्नस्य तस्य यौवनमत्यगात् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
विषय़ेष्वनभिज्ञोऽहं धर्मार्थं किल सन्ततिः ||
६२ ख