भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाभिमन्युश्च शिखण्डी च महारथः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाभिमन्युश्च सात्यकिश्च महारथः ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
द्रौपदेय़ाश्च मां तात रक्षिष्यन्ति न संशय़ः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपदेय़ाश्च ये पञ्च वभूवुर्भरतर्षभ |
८८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाश्च शत्रुघ्नं शूरमार्ताय़निं शरैः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाश्च संरव्धाः शैशुपालिश्च वीर्यवान् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाश्च संहृष्टा धृष्टकेतुः ससात्यकिः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाश्च संहृष्टा राक्षसश्च घटोत्कचः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाश्च सङ्क्रुद्धा अभ्यघ्नंस्तावकं वलम् ||
५७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपदेय़ाश्च सौभद्रो राक्षसश्च घटोत्कचः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ाश्चतुःषष्ट्या सहदेवश्च सप्तभिः |
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
द्रौपदेय़ास्तथा पञ्च पाञ्चालाश्चेदय़स्तथा ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
द्रौपदेय़ास्तथा पञ्च सौभद्रश्चापराजितः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ास्तथा शूरा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ||
४१ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ास्त्रिसप्तत्या धर्मराजश्च सप्तभिः |
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ास्त्रिसप्तत्या युय़ुधानस्तु सप्तभिः ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ास्त्रिसप्तत्या सप्तभिश्च घटोत्कचः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
द्रौपदेय़ैस्तथा शूरैरभ्यवर्तत हृष्टवत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या कृष्णय़ा सार्धं नमश्चक्रुर्जनार्दनम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या चानवद्याङ्ग्या गमनाय़ मनो दधे ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
द्रौपद्या देवविहितो विवाहश्चाप्यमानुषः ||
८८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या नः सहासीनमन्योऽन्यं योऽभिदर्शय़ेत् |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या यत्सभामध्ये सव्यमूरुमदर्शय़त् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या रक्षणं कार्यमित्युवाच धनञ्जय़म् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या वनवासिन्याः प्रिय़ं कर्तुं समुद्यतः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या वर्धय़न्हर्षं गदामादाय़ पाण्डवः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या व्राह्मणेष्वेव धर्मः सुचरितो महान् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
द्रौपद्या सह धर्मज्ञो वसतिं तामुवास ह ||
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
द्रौपद्या सह राजेन्द्र भ्रातृभिश्च महात्मभिः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या सह सङ्गम्य पश्यमानोऽभ्ययात्प्रभुः |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
द्रौपद्या सह सम्भूतं धृष्टद्युम्नं च पावकात् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या सहितः श्रीमान्हैडिम्वेय़ादिभिस्तथा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
द्रौपद्या सहिता देव्या सिद्धिं परमिकां गताः ||
२३० ग
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या सहितान्काले संस्मरन्भ्रातरं जय़म् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्या सहितो धीमान्धर्मपत्न्या नराधिपः ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
द्रौपद्या ह्यपकर्तारस्तव चैश्वर्यहारिणः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याः केशपक्षस्य दिष्ट्या त्वं पदवीं गतः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याः पाण्डवा राजन्परां प्रीतिमवर्धय़न् ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
द्रौपद्याः प्रिय़कामेन केवलं वाहुसंश्रय़ात् |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याः प्रिय़मन्विच्छन्स्ववाहुवलमाश्रितः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याः प्रेक्षमाणाय़ाः सव्यमूरुमदर्शय़त् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याः संमतं दूतं प्राहिणोद्भरतर्षभ ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
द्रौपद्याधिगतं सर्वं दमय़न्त्या यथाशुभम् ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं कस्तेषां क्षन्तुमर्हति ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं द्यूते च परुषा गिरः |
२७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं न चिन्तय़तुमर्हसि ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं प्रणोत्स्यामि हते त्वय़ि ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं संस्मरन्पुरुषो भव ||
६ ख