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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्याश्च यन्महाराज द्रौपद्याश्च हृदि स्थितम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कुन्त्याश्च वरदानेन माय़या च शतक्रतोः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्याश्च विपुलप्रज्ञ प्रज्ञा कार्त्स्न्येन ते श्रुता ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्यास्तु वचनं श्रुत्वा पाण्डवा राजसत्तम |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्यास्तु वचनं श्रुत्वा भीष्मद्रोणौ महारथौ |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कुन्तय़ो युधि विक्रान्ता महासत्त्वा महावलाः |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
कुन्तय़ोऽवन्तय़श्चैव तथैवापरकुन्तय़ः ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्दनं कुसुमं चैव कुमुदं च महाय़शाः |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
संवर्त उवाच
कुपितस्त्वां न हीदानीं भस्म कुर्यां सवान्धवम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
कुपिता ह्रीमती प्राज्ञा पती भीमार्जुनावुभौ ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
कुपिताः समुदीक्षन्ते दावेष्वग्निशिखा इव ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
कुपितास्तव राजेन्द्र व्राह्मणा निस्कृतिं चर ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
कुपितास्ते ततः सर्वे मुनय़ः सूर्यवर्चसः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागताः ||
१० ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
कुपितेनान्तकेनेव प्रजाः सर्वा जिघांसता ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
कुपितैर्दंशय़ामास सर्वेष्वेवाङ्गमर्मसु ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
कुपितोऽतिरथः शीघ्रं कृतवर्माणमभ्ययात् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
कुप्यभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन्नेकादशीं नृप |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
कुभार्यां च कुपुत्रं च कुराजानं कुसौहृदम् |
८९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
कुमार इव भूतानां वसूनामिव हव्यवाट् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभय़ापहम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारं देवगर्भाभं राजीवनिभलोचनम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
कुमारं द्वादशभुजं स्कन्दं राजानमादिशत् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारं रूपसम्पन्नं वृहन्तं चारुदर्शनम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
कुमारं विगतानन्दं निशाकरमिव च्युतम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
कुमारं शितिपादास्तु रुक्मपत्रैरुरश्छदैः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
कुमारकास्ततो हंसान्दृष्ट्वा काकमथाव्रुवन् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
कुमारकोटिमासाद्य निय़तः कुरुनन्दन |
१२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
कुमारगुरवे नित्यं नीलग्रीवाय़ वेधसे |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
कुमारधारा तत्रैव त्रिषु लोकेषु विश्रुता ||
१२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
कुमारपितरं पिङ्गं गोवृषोत्तमवाहनम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
कुमारपित्रे त्र्यक्षाय़ प्रवराय़ुधधारिणे |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
कुमारमभिगत्वा च वीराश्रमनिवासिनम् |
१२६ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारमाशु जानीत यदि जीवति वा न वा |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
कुमारवच्च स्मय़से द्यूते विनिकृतेषु यत् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
कुमारश्च कलिङ्गानामीश्वरो युद्धदुर्मदः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारश्च महावीर्यः कार्त्तिकेय़ इति स्मृतः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २०७
युधिष्ठिर उवाच
कुमारश्च यथोत्पन्नो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
कुमारस्तु ततो द्रोणं साय़केन महाहवे |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४१
विदुर उवाच
कुमारस्य तु या वुद्धिर्वेद तां शाश्वतीमहम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
कुमारस्यान्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
कुमारस्यान्तरप्रेक्षी वभूव वलवृत्रहा ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
जनमेजय़ उवाच
कुमारस्याभिषेकं तु व्रह्मन्व्याख्यातुमर्हसि ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारा उत्तरं चक्रुः स्पर्धमाना वृकोदरम् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारा योधमुख्याश्च गणिकाश्च स्वलङ्कृताः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारा रूपसम्पन्नाः सर्वशस्त्रविशारदाः ||
१०१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धय़े ||
७ ग
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
कुमाराः समलङ्कृत्य पर्यागच्छन्तु मे पुरात् |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
कुमारानुचरा राजन्पूरय़न्तो दिशो दश ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
कुमाराश्च कुमार्यश्च ये प्रोक्ताः स्कन्दसम्भवाः |
३० क