द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
विससर्जार्जुनस्तूर्णं सैन्धवस्य वधे वृतः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
विसान्निःसरमाणं तु दृष्ट्वा शक्रं महौजसम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
विसिस्मापय़िषुः पातैराचक्षाणोऽऽत्मनः क्रिय़ाम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
विसिस्मापय़िषुर्लोकं विद्यया व्रह्मवित्तमः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
विसिस्मिय़े तदा भीमो जहृषे च पुनः पुनः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
विसूताश्वरथं कृत्वा ललाटे त्रिभिरार्पय़त् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
विसृजंश्चोपसर्पंश्च तद्वत्पश्य शरीरिणम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
विसृजंस्तव पुत्राणामन्तं गच्छति कौरव ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
विसृजञ्शरवर्षाणि कालवर्षीव तोय़दः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
विसृजञ्शरवर्षाणि व्यधमत्पार्थिवं वलम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
विसृजञ्शुशुभे राजा यथा वैश्रवणस्तथा ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
विसृजञ्श्लेष्मपित्तानि कृपणं परिदेवय़न् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्तं च कौन्तेय़ं नानुपश्यामहे तदा ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्तं शितान्वाणानवारय़त तं युधि ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्तः शरांश्चैव तोमरांश्च सहस्रशः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्तः शरान्घोरान्कृतवर्माणमार्दय़न् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
विसृजन्तः शरान्दीप्तान्समन्तात्पर्यवारय़न् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्तो वहून्वाणान्क्रोधसंरक्तलोचनाः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्तौ च शतशो गभस्तीनिव भास्करौ ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
विसृजन्तौ महावृक्षौ तद्वनं व्याप्य तिष्ठतः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्तौ शरांश्चित्रान्विभ्राजेतां मनस्विनौ ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्दिक्षु सर्वासु शरानसितसारथिः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्दृश्यते वाणान्धारा मुञ्चन्निवाम्वुदः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्निषुजालानि युय़ुधानरथं प्रति ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्निषुजालानि सहसा तान्यताडय़त् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्विमलांस्तीक्ष्णान्नाराचाञ्ज्वलनप्रभान् ||
६६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्विशिखान्राजन्स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्सशरं चापं मूर्छय़ाभिपरिप्लुतः ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
विसृजन्साय़कांश्चैव विषाग्निप्रतिमान्वहून् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
केश्यु उवाच
विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मय़ा |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
विसृजास्त्रं परं पार्थ राधेय़ो ग्रसते शरान् |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
विसृजेत्सङ्क्षिपेच्चापि वोधय़ेत्सामरं जगत् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
विसृजेत्सङ्क्षिपेच्चैव वोधय़ेत्सामरं जगत् ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
विसृजेन्न च लुव्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
विसृजैतत्त्वमप्याजावस्त्रमस्त्रनिवारणम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
गौतम्यु उवाच
विसृजैनमवुद्धिस्त्वं न वध्योऽर्जुनक त्वय़ा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
विसृज्य काय़मेष्यन्ति पन्थानमपुनर्भवम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
विसृज्य कृष्णं त्वथ धर्मराजो; विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
विसृज्य तानृषीन्सर्वान्कामपि प्रस्थितो दिशम् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
विसृज्य दूतं दाशार्णं द्रुपदः शोककर्शितः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४४
भीष्म उवाच
विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रिय़ाः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
विसृज्य धृतराष्ट्राय़ राज्यं स विदुराय़ च |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
युधिष्ठिर उवाच
विसृज्य भक्षान्विविधान्यथा रक्षोगणास्तथा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
विसृज्य भूतेषु महत्सु देहं; तदाश्रय़ं चैव विभर्ति रूपम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
विसृज्य शरवृष्टिं तां दश राजन्महारथाः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
विसृज्य सर्वलोकात्मा जगाम भवनं स्वकम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
विसृज्य सर्वान्नृपतीन्विराटप्रमुखांस्तदा |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
विसृज्य सर्वान्भ्रातॄंश्च पाञ्चालानथ सोमकान् |
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ||
४७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
विसृज्यमानं चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च ||
३७ ख