विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
वीर्योन्नद्धा वलोदग्रा राज्ञा समभिपूजिताः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
वीषामुखान्वित्रिवेणून्व्यस्तदण्डकवन्धुरान् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
वुद्द्यापः सोऽसृजन्मेघांस्तथा स्थावरजङ्गमान् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
करालजनक उवाच
वुद्धमप्रतिवुद्धं च वुध्यमानं च तत्त्वतः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
वुद्धमप्रतिवुद्धं च वुध्यमानं च तत्त्वतः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
वुद्धश्चोक्तो यथातत्त्वं मय़ा श्रुतिनिदर्शनात् ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
वुद्धानामपि संमोहः प्रश्नेऽस्मिन्भरतर्षभ |
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्धिं च तव राजेन्द्र यमय़ोर्विनय़ं तथा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
वुद्धिं चतुर्गुणां ज्ञात्वा तमश्च त्रिगुणं महत् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
वुद्धिं तमसि संसक्तां तमो रजसि चाश्रितम् |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
वुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽपाचीनानि पश्यति ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
वुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽपाचीनानि पश्यति ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्धिं न कुरुतेऽपत्ये तथा राज्यानुशासने ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्धिं समाच्छाद्य च मे समन्यु; रुद्धूय़ते प्राणपतिः शरीरे ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
वुद्धिः कर्मगुणैर्हीना यदा मनसि वर्तते |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्धिः कर्मसु विज्ञेय़ा रिपूणां च वलावलम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
वुद्धिः कालो मनो व्योम कामक्रोधौ तथैव च ||
८९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
वुद्धिः प्रज्ञोपलव्धिश्च तथा ख्यातिर्धृतिः स्मृतिः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
वुद्धिः प्रज्ञोपलव्धिश्च संवित्ख्यातिर्धृतिः स्मृतिः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
वुद्धिः प्रभावस्तेजश्च सत्त्वमुत्थानमेव च |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
वुद्धिः सततमन्वेति छाय़ेव पुरुषं निजा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
वुद्धिकर्मेन्द्रिय़ाणां हि प्रमत्तो यो न वुध्यते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
वुद्धितो मित्रतश्चापि सततं वसुधाधिपः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
वुद्धित्यागं पुरस्कृत्य तादृशं प्रव्रवीमि ते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
वुद्धिद्रव्येण दृश्येत मनोदीपेन लोककृत् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
वुद्धिद्वैधं वेदितव्यं पुरस्तादेव भारत ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
वुद्धिपूर्वं तु धर्मस्य व्यवसाय़ः कृतो मय़ा ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
वुद्धिपूर्वं स्वय़ं धीरः पुरुषस्तत्र कारणम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
वुद्धिपौरुषसम्पन्नास्त्वय़ा तुल्याधिका जनाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
वुद्धिप्रहीणो मनसासमृद्ध; स्तथा निराशीर्गुणतामुपैति |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्धिमत्तां च कृष्णस्य वुद्ध्वा युध्येत को नरः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
वुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नराणां तु द्विजातय़ः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
वुद्धिमन्तं कृतप्रज्ञं शुश्रूषुमनसूय़कम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
वुद्धिमन्तं च मूढं च शूरं भीरुं जडं कविम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
वुद्धिमन्तं हनूमन्तं हिमवन्तमिव स्थितम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
भीष्म उवाच
वुद्धिमन्तो गताः स्वर्गं तुष्टात्मानो जितेन्द्रिय़ाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वुद्धिमान्वाक्यसम्पन्नस्तद्वाक्यमनुवर्णय़न् |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
वुद्धिमान्वै कुरुश्रेष्ठ प्राप्नुय़ाच्च महद्यशः ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
वुद्धिमार्गप्रय़ातस्य सुखं त्विह परत्र च ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
वुद्धिमाविश्य भूतानां धर्मार्थेषु प्रवर्तते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
वुद्धिमास्थाय़ लोकेऽस्मिन्वर्तितव्यं यतात्मना ||
९४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वुद्धिमास्थाय़ विपुलां जरासन्धजिघांसय़ा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
वुद्धिरध्यवसानाय़ साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
वुद्धिरध्यवसाय़ाय़ क्षेत्रज्ञः साक्षिवत्स्थितः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
वुद्धिरध्यवसाय़ेन ध्यानेन च महांस्तथा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
वुद्धिरध्यात्ममित्याहुर्यथावेदनिदर्शनम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
वुद्धिरात्मा च सहिता धर्मं पश्यन्ति नित्यदा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
वुद्धिरात्मा मनः कालो दिशश्चैव गुणा दश ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
वुद्धिरात्मा मनुष्यस्य वुद्धिरेवात्मनोऽऽत्मिका |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
वुद्धिरात्मानुगा तात उत्पातेन विधीय़ते |
२५ क