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विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मितान्यथ भूतानि तौ दृष्ट्वा संय़ुगे तदा |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
विस्मितान्यभवन्राजन्पूजय़ां चक्रिरे च तत् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
विस्मिताश्च प्रहृष्टाश्च क्षत्रधर्मं निशाम्य ते |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
विस्मिताश्च विषण्णाश्च वभूवुः सहिताः सुराः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
विस्मिताश्चाभवन्केचित्केचिदासन्नमर्षिताः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
नल उवाच
विस्मिताश्चाभवन्दृष्ट्वा सर्वा मां विवुधेश्वराः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
विस्मितैरीरितः शव्दः प्रशंसद्भिर्नलं नृपम् ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मितो हृष्टलोमा च वभूवास्राविलेक्षणः ||
२२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
विस्मितोऽभवदत्यर्थं यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
विस्मितौ तौ तु दृष्ट्वा तं तदाश्चर्यं विचिन्त्य च |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
विस्मृतं मे तदादाय़ नदीतीरादिहाव्रज ||
४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जय़द्रथम् ||
३२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं च यय़ौ विप्रस्तद्दृष्ट्वा रूपमैश्वरम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
विस्मय़ं जग्मतुश्चोभौ तौ वीरौ रामलक्ष्मणौ ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं जनय़ामासुर्महर्षीणां समेय़ुषाम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं गत्वा तलमाहत्य पूजय़त् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं परमं गत्वा नोचुः किञ्चन भारत ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं परमं गत्वा प्रत्युवाच जनार्दनम् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं गत्वा प्रैक्षन्त कुरवस्तदा ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुः किमु मानुषय़ोनय़ः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुः पार्थिवा भरतर्षभ ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुः प्रेक्षमाणाः परस्परम् ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुः सर्वे ते व्राह्मणर्षभाः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुः स्तुतिभिश्चाप्यपूजय़न् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुर्दृष्ट्वा कृष्णौ तथागतौ ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुर्देवगन्धर्वदानवाः ||
४२ ग
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुर्देवगन्धर्वदानवाः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मुस्ततस्ते वसुधाधिपाः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं जग्मू रथिनः सह दैवतैः ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
विस्मय़ं परमं प्राप्तस्तद्दृष्ट्वा महदद्भुतम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं परमं प्राप्ताः पितामहमपूजय़न् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ं सर्वभूतानि जग्मुर्भारत संय़ुगे ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ः सर्वभूतानां प्रहर्षश्चाभवत्तदा ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ः सर्वभूतानां समपद्यत भारत ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
विस्मय़ः सुमहानासीन्मधुकैटभय़ोस्तदा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़श्चैव मे वीर सुमहान्मनसोऽद्य वै |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ाच्चोत्तरीय़ाणि व्याविध्यन्सर्वतो नृपाः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
विस्मय़ो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः ||
६८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
विस्मय़ो मे परो जातो दृष्ट्वा सर्वमिदं महत् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ो मे महान्पार्थ तव दृष्ट्वा शरानिमान् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
विस्मय़ो मे महान्राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ||
७७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़ोत्फुल्लनय़नाः साधु साध्विति भारत ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
भीष्म उवाच
विस्मय़ोत्फुल्लनय़नो वलिं पप्रच्छ वासवः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
विस्रंसय़न्ति मन्त्रं च विवृण्वन्ति च दुष्कृतम् |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
युधिष्ठिर उवाच
विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान्प्रवदता विभो |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
विस्रवच्छोणिताक्ताङ्गः पप्रच्छेदं पितामहम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
विस्रव्धो भव राजेन्द्र न व्यलीकं द्विजोत्तमः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
नाग उवाच
विस्रव्धो मां द्विजश्रेष्ठ विषय़े योक्तुमर्हसि ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
विस्वरं चुक्रुशुश्चान्ये वह्ववद्धं तथावदन् |
८३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
विहगः सुमुखो यत्र सुपर्णस्यात्मजः किल |
१२ क