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अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
विहगाश्च मुदा युक्ताः प्रानृत्यन्व्यनदंश्च ह |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
विहगैरुपय़ुक्तस्य शैलाग्रात्पतितस्य वा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
विहगैर्नादितं पुष्पैरलङ्कृतमतीव च |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
विहङ्गः शरभो मोदः प्रमोदः संहताङ्गदः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
विहङ्गमं सुरामित्रं हरन्तममृतं वलात् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
विहताशः क्षणेनाथ तस्माद्देशादपाक्रमत् |
११७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
दुर्योधन उवाच
विहनिष्यति ते वुद्धिं विदुरो मुक्तसंशय़ः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
विहन्तुं देवराजस्य हेतुय़ुक्तैः पुनः पुनः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
विहन्यमानेष्वस्त्रेषु द्रोणः क्रोधसमन्वितः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
भीष्म उवाच
विहन्येतान्यथा कुर्वन्नरः कौरवनन्दन |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
विहरन्ति परस्वानि स वै क्षत्रिय़पांसनः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
विहरन्ति रमन्ते च न तेषु म्रिय़ते जनः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
विहरन्मद्यपानं चाप्यगम्यागमनं तथा ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
विहरन्सर्वतोमुक्तो न क्वचित्परिषज्जसे ||
१०६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
विहरस्व मय़ा सार्धं गतशोको निरामय़ः ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
विहरस्व यथा शक्रः सूदय़ित्वा महासुरान् ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय २
अर्जुन उवाच
विहरिष्यामि राजेन्द्र विराटभवने सुखम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
विहरिष्याम्यनासक्तः सुखी लोकान्निरामय़ः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
विहरेय़ुर्यथाकाममभिसृत्य पुनः पुनः ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
विहर्ता धृतराष्ट्रोऽय़ं राजराजाभिपूजितः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
विहर्तुकामौ सम्प्रीत्या मानुष्येषु पुरा प्रभू ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
विहर्तुमहमिच्छामि साह्यं कुरुत पुत्रकाः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १५२
राक्षसा ऊचुः
विहर्तुमिच्छेद्दुर्वृत्तः स विनश्येदसंशय़म् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
विहव्यस्य तु पुत्रस्तु वितत्यस्तस्य चात्मजः ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमव्रवीत् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
विहारदेशं सम्प्राप्य नानाद्रुमवदुत्तमम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
विहारशीलः क्रीडार्थं तेन तत्संवृतं सरः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचय़न् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
विहारावसथोद्यानकूपारामसभाप्रदाः |
९७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
विहाराहारकालेषु माल्यशय़्यासनेषु च |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
विहारो वृष्णिवीराणां महे रैवतकस्य ह |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
विहारो ह्यत्र देवानाममानुषगतिस्तु सा ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विहारय़ात्रासु पुनः कुरुराजो युधिष्ठिरः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
विहाय़ कामं क्रोधं च तथाहङ्कारमेव च |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
विहाय़ कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः |
७१ क
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
विहाय़ काम्यकं राजा सह भ्रातृभिरच्युतः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
अर्जुन उवाच
विहाय़ कीर्तिं विपुलं यशश्च; युद्धात्परावृत्य पलाय़से किम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
विहाय़ गच्छत्यनवेक्षमाण; स्तथा विमुक्तो विजहाति दुःखम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
विहाय़ तं पतगमहर्षिसेवितं; जगाम खं पुरुषवरस्य पश्यतः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ तान्वाणगणानथागतौ; सुहृद्वृतावप्रतिमानविक्रमौ |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
विहाय़ देहं निर्मुक्तो निर्द्वन्द्वः प्रशमं गतः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ फलकाले मां सुगृद्धां तव दर्शने ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
विहाय़ भगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः |
९ क
वन पर्व
अध्याय २६
मार्कण्डेय़ उवाच
विहाय़ भोगानचरद्वनेषु; नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ मद्राधिपतिं पतिं च; दुर्योधनं भारत भारतानाम् ||
५९ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
विहाय़ मां वरारोहे त्वां गच्छेत्सर्वचेतसा ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
विहाय़ मानं पुनरेव सभ्या; नुवाच कृष्णां किमहं व्रवीमि ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
विहाय़ यो गच्छति सर्वमेव; क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ राक्षसं युद्धे शैनेय़ो रथिनां वरः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २६
मार्कण्डेय़ उवाच
विहाय़ राष्ट्राणि वसूनि चैव; नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ||
१२ ख