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शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
त्वत्तः श्रवणजं चापि चतुर्थं जन्म मे विभो |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ६२
जनमेजय़ उवाच
त्वत्तः श्रुतमिदं व्रह्मन्देवदानवरक्षसाम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
जनमेजय़ उवाच
त्वत्तः श्रुतानि मे व्रह्मन्पाण्डवानां तु कीर्तय़ ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
युधिष्ठिर उवाच
त्वत्तः श्रोतुमहं सर्वं परं कौतूहलं हि मे ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
त्वत्तः सुहृत्तमं कञ्चिन्नाभिजानामि सात्यके ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
भीष्म उवाच
त्वत्तः स्थिता सकेय़ूरा दीप्यमाना स्वतेजसा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
कीट उवाच
त्वत्तपोवलनिर्दिष्टमिदं ह्यधिगतं मय़ा ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
त्वत्तश्च मे प्रिय़तरः पृथिव्यां नास्ति कश्चन |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
त्वत्तश्च मे प्रिय़तरा व्राह्मणा भरतर्षभ ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तस्तन्निःसृतं देव लोका वुद्धिमय़ा हि ते ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तेजःसम्भवो नित्यं हुताशो मधुसूदन |
९ क
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
त्वत्तेजसा च निहताः कालेय़ाः क्रूरविक्रमाः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
त्वत्तो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
युधिष्ठिर उवाच
त्वत्तो धर्मार्थसंय़ुक्तमाय़त्यां च सुखोदय़म् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
त्वत्तो मे मानसं जन्म प्रथमं द्विजपूजितम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
त्वत्तो वहुतराश्चान्ये भविष्यन्ति पुरन्दर ||
४७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
त्वत्तो वा तव वामात्यैर्भिद्यते जातु मन्त्रितम् ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
त्वत्तो विशिष्टं वीर्येण धनुष्यमरराट्समम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
त्वत्तो हि वलिनः पूर्वे राजानः सपुरोहिताः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
त्वत्तो ह्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेय़मुत्तमम् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
काक उवाच
त्वत्तोऽतिरिक्तः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो व्राह्मणो यथा ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तोऽद्य भगवन्नस्त्रं कृत्स्नमिच्छामि वेदितुम् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तोऽनुज्ञाप्रतीक्षां मां विद्ध्यस्मिन्कर्मणि स्थिताम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
त्वत्तोऽन्यः कः पुमाँल्लोके श्रोतुमेतदिहार्हति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
शर्मिष्ठो उवाच
त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेय़ं धर्ममुत्तमम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
शर्मिष्ठो उवाच
त्वत्तोऽपि मे पूज्यतमो राजर्षिः किं न वेत्थ तत् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
त्वत्तोऽपि मे प्रिय़तरा व्राह्मणा भरतर्षभ ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण व्राह्मणो हिंसितो हि नः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान्संय़ोगः शाश्वतोऽस्तु नौ |
५५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तोऽहं दुर्लभं काममनवाप्यैव केशव |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्प्रपन्नाय़ भक्ताय़ गतिमिष्टां जिगीषवे |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
त्वत्प्रपन्नाय़ भक्ताय़ शिरसा प्रणताय़ च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
त्वत्प्रभावसमुत्थोऽसौ प्रभावो नो विनश्यति ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
त्वत्प्रभावादिय़ं देव वाक्चैव प्रतिभाति मे ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्प्रभावार्जितान्भोगानश्नीम यदुनन्दन |
२० क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्प्रसादं प्रतीक्षंस्तु सहतेऽय़ं वृकोदरः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादं प्रतीक्षन्ते त्वद्भक्ताश्च विशां पते ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादसमुत्थेन विक्रमेणारिसूदन |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
त्वत्प्रसादाच्च मे जन्म तृतीय़ं वाचिकं महत् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीय़ते |
१२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्प्रसादाज्जय़ः प्राप्तो राज्ञा वृष्णिकुलोद्वह |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादात्प्रकाशत्वं जगत्प्राप्तं नरोत्तम ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्प्रसादात्सदा शैल व्राह्मणाः क्षत्रिय़ा विशः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
त्वत्प्रसादात्समुच्छेदं न गच्छेत्सामरं जगत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभय़ाः |
१११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभय़ाः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
त्वत्प्रसादादिमं लोकं तारय़िष्यन्ति शाश्वतम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
त्वत्प्रसादाद्गमिष्यामि गतिमिष्टां महाद्युते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
त्वत्प्रसादाद्धि लभ्यन्ते न लभ्यन्तेऽन्यथा विभो ||
६५ ख