वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
वीज्यमानमिवाक्षोभ्यं तीरान्तरविसर्पिभिः ||
५३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
वीजय़ज्ञो मय़ाय़ं वै वहुवर्षसमाचितः |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
वीटां मुखे समाधाय़ वाय़ुभक्षोऽभवन्मुनिः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वीणा वा नाद्य वाद्यन्ते शम्यातालस्वनैः सह ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
वीणानां वल्लकीनां च नूपुराणां च शिञ्जितैः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
वीणानां वल्लकीनां च वेणूनां च विशां पते |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
वीणापणववेणूनां स्वनश्चातिमनोरमः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वीणेव मधुराभाषा गान्धारं साधु मूर्च्छिता |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
वीतभीः प्रविशाम्येतां शाल्वस्य महतीं चमूम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
वीतभीश्चापि ते राजञ्शात्रवैः सह योत्स्यते ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
वीतमोहक्लमं विप्रं ज्ञानतृप्तं जितेन्द्रिय़म् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
वीतरागभय़क्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
वीतरागभय़क्रोधा मन्मय़ा मामुपाश्रिताः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
वीतरागश्च पुत्रस्ते परमात्मा भविष्यति |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
वीतरागश्चरन्नेवं तुष्टिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
वीतरागा महाप्राज्ञा ध्यानाध्ययनसम्पदा ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः सर्ववन्धनैः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
वीतरागान्यतीन्सिद्धान्वीर्ययुक्तांस्तपोधनान् ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
वीतरागो जितक्रोधः सम्यग्भवति यः सदा |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
वीतशोकः स राजर्षिः पुनराश्रममागमत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वीतशोकभय़ावाधं कच्चित्त्वं दृष्टवान्नृपम् ||
९९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
वीतशोकभय़ावाधाः सुखस्वप्नविवोधनाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
वीतसंमोहदोषश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
वीतहर्षभय़क्रोधो धृतिमाप्नोति पण्डितः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
वीतहर्षभय़क्रोधो व्राह्मणो नावसीदति ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
वीतहर्षभय़क्रोधो व्राह्मणो नावसीदति ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
वीतहव्यश्च राजर्षिः श्रुतो मे विप्रतां गतः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
वीतहव्यो महाराज व्रह्मवादित्वमेव च ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
वीतीकृतममेय़ात्मा प्राहिणोन्मधुसूदनः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
वीथीं कुर्वन्महावाहुर्द्रावय़न्मम वाहिनीम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
वीभत्समशुभं वापि रोगा वा तत्र केचन |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
वीभत्सुं प्रत्यपद्यन्त पदातिनमवस्थितम् ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
वीभत्सुरतिवीभत्सं कर्मेदमकरोत्कथम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
वीभत्सुरपि गीतेन सुनृत्तेन च पाण्डवः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सुरव्रवीत्कृष्णमस्वस्थहृदय़स्ततः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं तु वृकोदरः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं तु वृकोदरः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सुर्भीमसेनेन सात्वतेन च रक्षितः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सुर्मां यथोवाच तथावैम्यहमप्युत ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
वीभत्सुर्वासुदेवेन सहितो नृपसत्तम ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
वीभत्सुर्विजय़ः कृष्णः सव्यसाची धनञ्जय़ः ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
वीभत्सुशरसञ्छन्नाञ्शोणितौघपरिप्लुतान् |
११५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
वीभत्सुश्च महातेजा निवेदय़ति ते गृहान् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सुस्तानथाविध्यद्भीमस्य प्रिय़काम्यया ||
४४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सो पश्य सैन्यं स्वं भज्यमानं समन्ततः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सो विप्रकर्माणि विदितानि मनीषिणाम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सोः कोपदीप्तस्य दग्धाः कृपणचक्षुषा ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
वीभत्सोः स्यन्दनं प्राप्य ततः शान्तिमविन्दत ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
वीभत्सोर्वचनं सम्यक्सत्यमेतद्युधिष्ठिर |
२ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसन्ध महीपते |
५३ क