आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनय़िष्यसि ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
वीर स्वय़ं प्रय़ाह्याशु यत्र यातो धनञ्जय़ः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
वीरं गण्डीवधन्वानमृते जिष्णुं कपिध्वजम् ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वीरं मन्यत आत्मानं येन पापः सुय़ोधनः |
६५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
वीरं हि क्षत्रिय़ं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वीरः कमलपत्राक्षः क्षितावासीन्नराधिप ||
६७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
वीरः पुरुषशार्दूलः कथं जीवति पाण्डवः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
वीरः शिखण्डी द्रौपदोऽसौ महात्मा; मय़ाभिगुप्तेन हतश्च तेन ||
८४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
वीरः श्रुताय़ुश्च श्रुताय़ुधश्च; चित्राङ्गदश्चित्रवर्मा स वीरः |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वीरः सङ्ग्रामजिद्विद्वान्मम भर्ता विशां पतिः ||
७३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
वीरकर्माणि कुर्वाणाः पुत्रास्ते निधनं गताः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
वीरकांस्यमुपादाय़ काञ्चनं समलङ्कृतम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
वीरणश्चाप्यधीत्यैनं रौच्याय़ मनवे ददौ |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
वीरणस्तम्वके मूलं यदप्येकमिह स्थितम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
वीरणस्तम्वके लग्नाः सर्वतः परिभक्षिते |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
वीरताय़ां नरव्याघ्र धनञ्जय़समो ह्यसि ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
राजो उवाच
वीरद्युम्न इति ख्यातो राजाहं दिक्षु विश्रुतः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
वीरधन्वा ततः क्रुद्धो धृष्टकेतोः शरासनम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
वीरधन्वा महेष्वासस्त्वरमाणः समभ्ययात् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
वीरधन्वा महेष्वासो वारय़ामास भारत ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वीरधामा च कौरव्य भूमिपालश्च नामतः ||
५६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वीरपत्नीभिराकीर्णं गङ्गातीरमशोभत ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वीरप्रद्वेषणान्मूढ नित्यं क्रोष्टेव लक्ष्यसे ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
वीरलोकं समासाद्य सुखं प्राप्स्यन्ति केवलम् ||
४५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वीरलोकगतिं प्राप्तो युद्धे हुत्वात्मनस्तनुम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वीरलोकगतो वीरो वीरय़ोगवहः सदा |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
वीरवाहुविसृष्टानां तोमराणां विशां पते |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
वीरवाहुविसृष्टानां सर्वावरणभेदिनाम् |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वीरवाहुविसृष्टाभिः शक्तिभिः परिघैरपि |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
वीरवाहुविसृष्टाश्च योधेषु च गजेषु च |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
वीरवाहुश्च ते पुत्रो वैराटिं रथसत्तमम् |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
वीरशव्दफलं चैव तेन संय़ुज्यतां भवान् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
वीरशोणितसिक्ताय़ां भूमौ भरतसत्तम |
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
वीरश्चित्राङ्गदो नाम वीर्येण मनुजानति ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वीरशय़्यामुपासद्भिर्वीरस्थानोपसेविभिः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वीरसूभिर्महावाहो हतपुत्राभिरावृतम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
वीरसूर्वीरपत्नी च सर्वैः समुदिता गुणैः |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरश्वशुरवान्धवा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
वीरसेनसुतो यैश्च राज्यात्प्रभ्रंशितः पुरा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
वीरस्थानाम्वुपङ्के च शय़नं फलकेषु च ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वीरस्थाय़ी च सततं स वीरगतिमाप्नुय़ात् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ||
११२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ||
९२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
वीरहीनं वृद्धवालं पौरजानपदास्तथा |
३४ ख
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वीरा न श्रद्दधुस्तस्य विनाशं शार्ङ्गधन्वनः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वीरा वीरैर्महाघोरं कलहान्तं तितीर्षवः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
वीरांस्तु स हि तान्मेने प्राप्तराज्यान्स्वधर्मतः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
वीराः समासदन्वीरानगच्छन्भीरवः परान् ||
९ ख