भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
वीराः स्वशिविराण्येव ध्याय़न्तः परमातुराः |
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
वीराङ्गदकिरीटेषु निष्प्रभा समपद्यत ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
वीराङ्गरूपाः पुरुषा नागराजकरोपमाः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
धृतराष्ट्र उवाच
वीराणां तन्ममाचक्ष्व स्थिरीभूतोऽस्मि सञ्जय़ ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
वीराणां रणधीराणां ये भिन्द्युः पर्वतानपि ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
वीराणां शत्रुभिः सार्धं देहपाप्मप्रणाशनम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वीराध्वानं प्रपद्येद्यस्तस्य लोकाः सनातनाः ||
५६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वीराध्वानमना नित्यं वीरासनरतस्तथा |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
वीरान्कृतास्त्रान्समरे सर्वानेवानुवर्तिनः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वीरापहारिणीमुग्रां मांसशोणितकर्दमाम् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
वीरासनं वीरशय़्यां वीरस्थानमुपासतः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वीरासनगतैर्नित्यं स्थण्डिले शय़नैस्तथा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
वीरास्थिशर्करा दुर्गा मांसशोणितकर्दमा ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वीरास्थिशर्करां रौद्रां भेरीमुरजकच्छपाम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
वीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमव्रवीत् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
वीरिण्या सह सङ्गम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वीरुदोषधय़श्चैव वीजानि विविधानि च |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
वीरुधश्चैव वृक्षांश्च यज्ञार्थं च तथौषधीः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
वीरुधामंशुमन्तं च भूतानां च प्रभुं वरम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
वीरैः प्रहारिभिर्युक्तः स्वैरनीकैः समावृतः |
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वीरैराकाङ्क्षितं मृत्युं सम्प्राप्तोऽभिमुखो रणे ||
६६ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
वीरैर्विहीनान्सर्वांस्ताञ्शक्रप्रस्थे न्यवेशय़त् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
वीरो दृप्तोऽभिमानी च नेदृशं मृत्युमर्हति ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
वीरो द्रोणविनाशाय़ धनुषा सह वीर्यवान् ||
९१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
वीरो वातपतिश्चैव झिल्ली पिण्डारकस्तथा |
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
वीरो वैकर्तनः शूरो विजय़स्त्वस्तु कृष्णय़ोः ||
५५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
वीरौ तावपि संरव्धौ संनिकृष्टौ महारथौ |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजय़काङ्क्षिणौ ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
वीर्यं च गिरिशो दद्याद्येनेन्द्रमपि शातय़ेत् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
वीर्यधैर्ययशःशौचैर्विक्रमेणौजसापि वा ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वीर्यमास्थाय़ कौन्तेय़ धुरमुद्वह धुर्यवत् ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
वीर्यवद्भिस्ततस्तैस्तु पीडितो राक्षसोत्तमः |
३६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
वीर्यवन्तो महात्मानः पौराणां च हिते रताः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा महीम् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
वीर्यवन्तौ महात्मानौ गदाकार्मुकधारिणौ |
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
वीर्यवांश्च महातेजा महात्मा च विशेषतः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
वीर्यवानस्त्रसम्पन्नः पराक्रान्तो महावलः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४९
कुन्त्यु उवाच
वीर्यवान्मन्त्रसिद्धश्च तेजस्वी च सुतो मम ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
वीर्यशुल्काश्च ता ज्ञात्वा समारोप्य रथं तदा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
कर्ण उवाच
वीर्यश्रेष्ठाश्च राजन्या वलं धर्मोऽनुवर्तते ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
वीर्यश्लाघी नरश्रेष्ठस्तान्दृष्ट्वा समुपस्थितान् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
वीर्यसत्त्ववलोत्साहतेजोभिरकृशाः कृशाः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
वीर्याद्दाक्ष्यादधृष्यत्वादर्थज्ञानान्नय़ाज्जय़ात् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वीर्येण शौर्येण वलेन चैव; तैस्तैश्च युक्ता विपुलैर्गुणौघैः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
वीर्येण संमितः पुत्रो मम भूय़ादिति स्म ह ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
वीर्येण सदृशः पुत्रस्त्वय़ा मत्तः पुरा वृतः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
वीर्येणाप्रतिमो लोके कवची कुण्डलीति च ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
वीर्येणाप्रतिमो लोके वृत्तेन च वलेन च |
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
वीर्येणाहं पुरुषं कार्यहेतो; र्दद्यामेषां पञ्चमं मत्प्रसूतम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
वीर्येणोपार्जितं मांसं यथा खादन्न दुष्यति ||
१६ ख