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वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
तत इन्द्रद्युम्नो मां चोलूकं चादाय़ तत्सरोऽगच्छद्यत्रासौ नाडीजङ्घो नाम वको वभूव ||
१० क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
तत इन्द्रो यवक्रीतमुपगम्य युधिष्ठिर |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
तत इन्द्रोऽकरोद्रूपं व्राह्मणस्य तपस्विनः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
तत इष्टिं चकारर्षिस्तस्य वै पुत्रकामिकीम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
तत इष्टेऽहनि तय़ोः पितरौ चक्रतुर्मुदा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
तत इष्ट्वा महाय़ज्ञैर्वहुभिर्भूरिदक्षिणैः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १६९
मातलिरु उवाच
तत उक्तो भगवता दिष्टमत्रेति वासवः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
तत उग्रं तपस्तप्त्वा वसिष्ठो व्रह्मवित्तमः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
तत उच्चावचा वाचः प्रिय़ाः प्रिय़चिकीर्षुभिः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
तत उच्चुक्रुशुः पार्थास्तेषां चानुचरा जनाः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तत उच्चुक्रुशुः सर्वे पाञ्चालाः पाण्डवैः सह |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १६९
वसिष्ठ उवाच
तत उच्छिद्यमानेषु भृगुष्वेवं भय़ात्तदा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १३१
लोमश उवाच
तत उत्कृत्तमांसोऽसावारुरोह स्वय़ं तुलाम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्कोचकं तीर्थं गत्वा धौम्याश्रमं तु ते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
तत उत्तममास्थाय़ वेगं वलवतां वरौ |
५६ क
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
तत उत्थाय़ कौरव्य प्रतिलभ्य च चेतनाम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ दाशार्ह ऋषभः सर्वसात्वताम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ दाशार्हः स्नातः प्राञ्जलिरच्युतः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १८८
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ भगवान्व्यासो द्वैपाय़नः प्रभुः |
२० क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
तत उत्थाय़ राजेन्द्र शाल्वः परमदुर्मनाः |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ रात्रौ सा विहाय़ शय़नं स्वकम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ विदुरं पाण्डवेय़ाः; प्रत्यगृह्णन्नृपते सर्व एव |
१० क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
तत उत्थाय़ वैदेहि तेषां मध्ये यशस्विनी |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
तत उत्थाय़ शैनेय़ो विमुक्तः सौमदत्तिना |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
भीष्म उवाच
तत उत्थाय़ स मुनिस्तदा परमविस्मितः |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ सक्रोधः सात्यकिर्वाक्यमव्रवीत् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
तत उत्थाय़ सहसा स्नानशालां विवेश ह |
११ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ हृष्टात्मा प्राञ्जलिः शिरसानतः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
तत उत्पत्स्यतेऽस्माकं कुले गोत्रविवर्धनः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
तत उत्सृज्य पाणिभ्यः प्रदीपांस्तव वाहिनी |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
तत उत्स्रष्टुकामांस्तानस्त्राण्यालक्ष्य पाण्डवः |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
तत उद्धर्षय़न्सर्वान्धृष्टद्युम्नोऽभ्यभाषत |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
तत उद्यतशूलः स राक्षसः समुपाद्रवत् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
तत उद्यम्य दण्डं स कालदण्डोपमं तदा |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तत उन्मत्तवद्राजन्न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
७८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तत उन्मत्तवद्राजन्निर्मर्यादमवर्तत ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तत उन्मत्तवद्राजन्निर्मर्यादमवर्तत ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
तत ऊचुर्महात्मानो देवाः सर्वे समागताः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
तत एकाक्षरं नादं भो इत्येव समीरय़न् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत एकान्तमुन्नीय़ पाराशर्यो युधिष्ठिरम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
तत एकान्तमुन्नीय़ मज्जय़ामास भारत |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
तत एकान्तशीलः स पश्यत्यात्मानमात्मनि ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
तत एतानि संय़म्य मनसि स्थापय़ेद्यतिः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तत एनं चिन्तय़ानमेव स पुरुष उवाच |
१६१ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तत एनं परिश्रान्तमुपलभ्य वृकोदरः |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
तत एनं परिष्वज्य सखा विप्रो महातपाः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनं महाकाय़ा महावीर्या महावलाः |
८ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनं महादेवः पीड्य गात्रैः सुपीडितम् |
४९ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनं महावाहुर्वाहुभ्याममरोपमः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तत एनं महावेगैरर्दय़ामास तोमरैः |
१३ क