chevron_left  ततस्तस्मिन्महावाहोarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
ततस्तस्मिन्महावाहो प्रादुर्भूते महात्मनि |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्मिन्मुनिश्रेष्ठा राजानं द्रष्टुमभ्ययुः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
ततस्तस्मिन्मुहूर्तेऽथ राजोपरिचरस्तदा |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
ततस्तस्मिन्वाणवर्षे व्यतीते; शरौघेण प्रत्यवर्षं गुरुं तम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
ततस्तस्मिन्सम्प्रवृत्ते सत्रे ज्वलितपावके |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्मिन्हते वीरे सौभद्रेणाश्मकेश्वरे |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
ततस्तस्मै वरान्प्रीतो ददावहमनुत्तमान् ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
ततस्तस्य गिरेः शृङ्गमास्थाय़ स खगोत्तमः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्य च तेषां च युद्धे देवासुरोपमे |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन ह |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपय़ाजो महातपाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य पुत्रमूर्धनि भूतलम् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
ततस्तस्य प्रसादात्ते महर्षेर्भावितात्मनः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्य प्रसादात्त्वं भक्तः प्राप्स्यसि तन्महत् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य प्राचिन्वत्वम् ||
१२ घ
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
ततस्तस्य मखं देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य महाञ्शोकः प्रादुरासीन्महात्मनः |
२ क
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
ततस्तस्य महाराज जमदग्नेर्महात्मनः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्य महावाहोस्तिष्ठतः परिचारकाः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य महीन्द्रस्य वितथः पुत्रकोऽभवत् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्य रथौघस्य मध्यं प्राप्य हय़ोत्तमाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
भीष्म उवाच
ततस्तस्य वचः श्रुत्वा रूपिणी धर्मवत्सला |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य वचः श्रुत्वा श्रद्दधाना वराङ्गनाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य वनषण्डस्य मध्येऽतीव रमणीय़ं सरो दृष्ट्वा साश्व एव व्यगाहत ||
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्य विनाशाय़ सत्वरं व्यसृजच्छरान् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य शरीरं तत्सर्वगन्धनिषेवितम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
ततस्तस्य सुरेशस्य क्रोधादमिततेजसः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्या विद्युतः प्रादुरास; न्नुल्काश्चापि ज्वलिताः कौरवेन्द्र |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्यां स भगवान्प्रीतिं चक्रे निशाकरः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्याः करौ शूनौ किणवद्धौ वृकोदरः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
ततस्तस्याज्ञय़ा राज्ञो विप्रतस्थे महद्वलम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्यानुय़ात्राणि ते चैव परिचारकाः |
३९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्यामिषीकाय़ां पावकः समजाय़त |
२० क
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
ततस्तस्यावय़ोश्चैव पतिमेकतमं वृणु |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तस्याश्रमं गत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्यै ददौ प्रीतो वहुरत्नं विशेषतः ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तस्यैव शाखाय़ां न्यग्रोधस्य विशां पते |
११४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्योत्तरं वाक्यं स्वरवर्णोपपादितम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
ततस्तस्योपसङ्गृह्य पादौ प्रश्नान्सुदुर्वचान् |
१ क
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्ता नर्तनागाराद्विनिष्क्रम्य सहार्जुनाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
ततस्ता नैषधं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः परमाङ्गनाः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १२७
लोमश उवाच
ततस्ता मातरः सर्वाः प्राक्रोशन्भृशदुःखिताः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
ततस्ता मातरस्तस्य रुदन्त्यः शोककर्शिताः |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्ता मुदिताः सर्वाः प्रशशंसुर्जनार्दनम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
ततस्ता योषितो राजन्क्रन्दन्त्यो वै मुहुर्मुहुः |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
ततस्ता राजशार्दूल धात्र्यो दाशार्णिकास्तदा |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
ततस्ता वर्धमानस्य कुमारस्य महात्मनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तदा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
ततस्तां कश्यपो दृष्ट्वा व्रजन्तीं पृथिवीं तदा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तां कौरवीं सेनां द्रवमाणां समन्ततः |
१८ क