शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वुभुक्षितस्य चान्नानि स्वादूनि भरतर्षभ |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वुभुक्षितानामर्थाय़ कॢप्तमन्नं समन्ततः ||
२० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
वुभुक्षुः क्षुधितो राजन्नाश्रमं कौशिकस्य ह ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
वुभुक्षय़ा पीड्यमानो विषय़ानेव धावसि ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
वुभुजे कृत्स्नमुन्मत्तः प्रादात्तस्मै च मुद्गलः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
वुभुत्समानस्तत्प्रज्ञामभिगम्येदमव्रवीत् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
वुभूषताभिमन्तव्यं सर्वदुश्चरितापहम् ||
९४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६९
धृतराष्ट्र उवाच
वुभूषद्भिर्ग्रहणीय़ामनिन्द्यां; परासूनामग्रहणीय़रूपाम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
जनमेजय़ उवाच
वुभूषुं भजमानं च प्रतिवाञ्छामि शौनक ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
वुभूषेद्वलवानेव सर्वं वलवतो वशे |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
वुवुधे तं तु सक्रोधं पितरं राक्षसेश्वरः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
वुवुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं महात्मनोः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
वुवुधे तांश्च स मुनिर्जातपक्षाञ्शकुन्तकान् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
वुवुधे शतपत्राणां वनं महदिवाम्भसि ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
दुर्योधन उवाच
वृंहन्ति कुञ्जरास्तत्र हय़ा हेषन्ति चासकृत् |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वृंहन्ति कुञ्जरास्तत्र हय़ा हेषन्ति चासकृत् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
वृंहन्तौ वाशिताहेतोः समदाविव कुञ्जरौ ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
वृंहितैः शिञ्जितैर्हासैः खुरनेमिस्वनैरपि |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वृकः शरशतैस्तीक्ष्णैः पाञ्चाल्यो द्रोणमर्दय़त् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
वृकगृध्रशृगालानां तुमुले मोदनेऽहनि |
७५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
वृकत्रासाच्च लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वृकस्तु परमक्रुद्धो द्रोणं षष्ट्या स्तनान्तरे |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
वृकस्थलं समासाद्य केशवः परवीरहा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
वृकस्थले निवसति स च प्रातरिहेष्यति ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
वृका इव विलुम्पन्ति दृष्ट्वैव पुरुषेतरान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय़ गच्छति ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय़ गच्छति ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
वृकैरिव वने रुद्धा पृषती हतय़ूथपा ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
वृको द्विपस्थं गिरिराजवासिनं; भृशं शरैर्द्वादशभिः पराभिनत् |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदर न युक्तं ते वचनं वक्तुमीदृशम् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
वृकोदर विराटे त्वं रंस्यसे केन कर्मणा ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरं कालमिवात्तदण्डं; गदाहस्तं पोथमानं त्वदीय़ान् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरं तथाय़ान्तं दृष्ट्वा तत्र जनार्दनः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
वृकोदरं परीप्सन्तः सूर्यमभ्रगणा इव ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरं भृशमभिपूजय़ंश्च ते; यथान्धके प्रतिनिहते हरं सुराः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरं वारणराजदर्पं; योधास्त्वदीय़ा भय़विग्नसत्त्वाः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरं समासाद्य संशय़ो विजय़े हि नः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरं सरथपदातिकुञ्जरा; युय़ुत्सवो भृशमभिपर्यवारय़न् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरः पर्वतकन्दराय़ां; विषादमोहव्यथितान्तरात्मा ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरः प्रेक्ष्य युधिष्ठिरं च; चकार कोपं परमार्तरूपः ||
४७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरः फल्गुनश्चैव वीरौ; माद्रीपुत्रौ विदुरः सञ्जय़श्च |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५६
विदुर उवाच
वृकोदरः सव्यसाची यमौ च; कोऽत्र द्वीपः स्यात्तुमुले वस्तदानीम् ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरकृते चाहमर्जुनश्च पुनः पुनः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरनिभाश्चैव केचिदञ्जनसंनिभाः |
१०० क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
वृकोदरवलो नान्यो न भूतो न भविष्यति |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरसमो युद्धे दृढः केकय़जो युधि |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरस्ततः कर्णं त्रिभिर्भल्लैः समाहितैः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरस्तदालोक्य नेत्रे उत्फाल्य लोहिते |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरस्तद्धृदय़े मम स्थितं; न तत्परोक्षं भवतः कुतः शमः ||
३० ख