भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरस्तव सुतांस्तथा व्यद्रावय़द्रणे ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरस्त्वसम्भ्रातस्तमेवोद्धृत्य तोमरम् |
५३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरस्य ता वाचः श्रुत्वा निर्वेदमागमत् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
वृकोदरस्य वीभत्सोर्भ्रात्रोश्च यमय़ोरपि ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरस्यापि ववन्द पादौ; माद्रीसुताभ्यामभिवादितश्च |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
वृकोदरार्जुनौ यत्र वृष्णिवीरश्च सात्यकिः |
३८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरेण क्षुद्रेण सुनृशंसमिदं कृतम् |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
वृकोदरेण राधेय़ो भारद्वाजेन चार्जुनः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरो नान्य इहैतदद्य; कर्तुं समर्थो भुवि मर्त्यधर्मा ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८२
अर्जुन उवाच
वृकोदरोऽहं च यमौ च राज; न्निय़ं च कन्या भवतः स्म सर्वे ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
वृक्षं गरुडवेगेन विनिहत्य तमेष्यति ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातय़ः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातय़ः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वृक्षचत्वरवासिन्यश्चतुष्पथनिकेतनाः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
वृक्षदं पुत्रवद्वृक्षास्तारय़न्ति परत्र च ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
वृक्षप्रपाताच्च भय़ं मूषकेभ्यश्च पञ्चमम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रिय़ाप्रिय़ः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रिय़ाप्रिय़ः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
वृक्षमूलशय़ो नित्यं शून्यागारनिवेशनः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
वृक्षवास्यनिकेतश्च चीरवासाश्च भारत ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वृक्षस्येव विनिश्चेरुः कोटरेभ्यः प्रदह्यतः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
वृक्षांश्च वहुलच्छाय़ान्ददृशुर्गिरिमूर्धनि |
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
वृक्षांश्चावस्थितान्पश्य य इमे मम वेश्मनि |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वाय़ुवाहनः ||
८७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युत्पतन्ति च |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भरद्वाज उवाच
वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
वृक्षाणां पतय़े चैव अपां च पतय़े तथा |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वृक्षात्फलमिवोद्धृत्य लगुडेन प्रमाथिना ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
वृक्षानङ्गारकारीव मैनान्धाक्षीः समूलकान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
वृक्षानथौषधीश्चैव छिन्दन्ति पुरुषा द्विज ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
वृक्षानासाद्य सन्त्रस्तास्तत्र तत्र निलिल्यिरे ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
वृक्षानिव महावाताः कम्पय़न्ति स्म तावकाः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
वृक्षानुन्मथ्य वान्त्युग्रा वाताः शर्करकर्षिणः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
वृक्षान्तरालोकितय़ा ज्योत्स्नय़ा चापि लक्षय़े ||
१०५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
वृक्षान्पद्मोत्पलधरान्सर्वर्तुकुसुमांस्तथा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
वृक्षान्वहुविधान्पार्थ वहन्तीं तीरजान्वहून् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
वृक्षाश्चौषधय़स्तत्र व्याश्रय़न्त किरीटिनम् ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
वृक्षाश्रितं तदा राजा ददर्श गतचेतनम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
वृक्षेषु जातास्ता देव्यो नमस्कार्याः प्रजार्थिभिः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
वृक्षेष्वासज्य सम्भग्नाः पतिता विषमेषु च |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
वृक्षेऽस्मिन्यानि पर्णानि फलान्यपि च वाहुक |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
वृक्षैः पुष्पफलोपेतैः सम्पन्नधनधान्यवान् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
वृक्षैरावृतकाय़ाय़ सेनान्ये मध्यमाय़ च ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
वृजिनं हि भवेत्किञ्चिद्यदि कर्णस्य पार्थिव |
१५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
वृजिनस्य नरेन्द्राणां नान्यत्संवरणात्परम् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
वृजिनां गतिमाप्नोति श्रेय़सोऽप्युपहन्ति च ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
वृजिने तारय़िष्यामि दुर्गेषु च नरर्षभान् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
वृणीमस्त्वां हय़ाग्र्याणां यन्तारमिति संय़ुगे ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
वृणीष्व काममन्यं त्वं व्राह्मण्यं हि सुदुर्लभम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
वृणीष्व कामान्धर्मज्ञ यावतो वाञ्छसे हृदा ||
१६ ख