आदि पर्व
अध्याय
१२१
राम उवाच
वृणीष्व किं प्रय़च्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत् ||
२० ग
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
व्रह्मो उवाच
वृणीष्व च वरं मत्तः शेष यत्तेऽभिकाङ्क्षितम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
वृणीष्व च वरं विप्र मत्तस्त्वं यमिहेच्छसि |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
राजो उवाच
वृणीष्व च वरं विप्र यमिच्छसि यथाविधि ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५१
जनमेजय़ उवाच
वृणीष्व यत्तेऽभिमतं हृदि स्थितं; तत्ते प्रदास्याम्यपि चेददेय़म् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
वृणीष्व राजन्सङ्कल्पो यस्ते हृदि चिरं स्थितः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
वृणीष्वाष्टौ वरान्कृष्ण दातास्मि तव सत्तम |
५१ क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
वृणुय़ुर्मरणं पार्था नानृतत्वं कथञ्चन ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
वृणोत्यनर्थं न त्वर्थं याच्यमानः सुहृद्गणैः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
वृणोत्विय़ं वरारोहा भर्तृत्वे वरवर्णिनी ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
वृणोमि कीर्तिं लोके हि जीवितेनापि भानुमन् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
युधिष्ठिर उवाच
वृणोमि त्वां महावाहो युध्यस्व मम कारणात् |
९३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
वृतं घटोत्कचं क्रूरैर्मरुद्भिरिव वासवम् |
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
वृतं देवगणैश्चैव प्रवभौ यज्ञमण्डलम् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वृतं दैत्याय़ुतैर्वीरैर्वलिभिर्दशभिर्नृप ||
६४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
वृतं नैकात्मकं येन कृत्स्नं त्रैलोक्यमात्मना |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
वृतं पारिषदैर्दिव्यैरात्मतुल्यपराक्रमैः ||
११८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
वृतं भूतगणैर्घोरैः क्रव्यादैश्च समन्ततः |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
वृतं सदस्यैर्वहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभैः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
वृतं सदस्यैर्वहुभिर्देवैरिव पुरन्दरम् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
वृतं सदस्यैर्वहुभिर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ||
२४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
वृतं समन्ताद्वहुभिः श्वापदैर्घोरदर्शनैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
वृतं साङ्ग्रामिकैर्द्रव्यैर्वहुशस्त्रपरिच्छदम् |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
वृतः कन्यागणैः सर्वैरात्मनीनैश्च पुत्रकैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
वृतः कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
वृतः प्रतिय़यौ हृष्टः सुहृदः सम्प्रहर्षय़न् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
वृतः प्राय़ान्महावाहुरर्जुनस्य रथं प्रति |
७४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
वृतः शतसहस्रेण रथानां रणशोभिनाम् ||
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
वृतः शतेन शूराणां रथानामनिवर्तिनाम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
वृतः शारद्वतोऽगच्छत्कष्टं कष्टमिति व्रुवन् ||
७८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
वृतः शिखण्डी त्वरितो राजानं पृष्ठतोऽन्वय़ात् ||
४९ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वृतः शिष्यैर्महातेजा दर्शय़ामास तं नृपम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
वृतः श्लक्ष्णकथैः प्राय़ान्मरुद्भिरिव वासवः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
वृतः स सर्वैरनुजैर्द्विजैश्च; तेनैव मार्गेण पतिः कुरूणाम् |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
वृतः सखाय़मन्वास्ते सदैव धनदं नृप ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
वृतः सर्वैस्तदा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
वृतः सहस्रैर्दशभिर्गजानामनिवर्तिनाम् |
६० क
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
वृतः सुमहता राजन्वलेन चतुरङ्गिणा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
वृतः सुरगणश्रेष्ठ मोक्षं तस्य विनिर्दिश ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
वृतः सृञ्जय़सैन्येन सात्यकेन च भारत ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
वृतः सैन्येन महता याहि यत्र महावलः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
वृतवान्परमं हृष्टः प्रतीपं सव्यसाचिनः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
वृतश्चैष महानागः स्थापितः समय़श्च मे |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
वृतस्तत्राहमगमं महापद्मशतैस्त्रिभिः |
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
वृतस्तान्योधय़ामास मद्रराजः प्रतापवान् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
वृतस्तय़ा नलो राजा पतिरस्मत्समीपतः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
वृता त्वनववोधेन सुखं तेन न गम्यते ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
वृता वलेन महता व्रह्मलोकपुरस्कृताः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्ठामासुराय़णीम् |
३ क