द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
वृतान्समन्तात्सङ्क्रुद्धैर्निःश्वसद्भिरिवोरगैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
वृतो गोपालकैः प्रीतो व्यहरत्कुरुनन्दनः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
वृतो दाशार्हप्रवरैः पुनराय़ाद्युधिष्ठिरम् ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
वृतो भरतशार्दूलो द्विषच्छोकविवर्धनः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
वृतो रथसहस्रैश्च दन्तिनां च शतैस्तथा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
वृतो वहुविधैर्योधैर्युधिष्ठिरमुपागमत् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
शुक्र उवाच
वृतोऽनय़ा पतिर्वीर सुतय़ा त्वं ममेष्टय़ा |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
वृहस्पतिरु उवाच
वृतोऽस्मि देवराजेन प्रतिज्ञातं च तस्य मे ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
वृतोऽय़ं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
वृतौ सहाय़ौ सत्रार्थे वृहद्द्युम्नेन धीमता ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
वृतौ हरिमहामात्रैश्चन्द्रसूर्यौ ग्रहैरिव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
वृत्त एष हृदि प्रौढो मृत्युरेष मनोमय़ः ||
३९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तं कल्याणवृत्तस्य पूजय़न्ति महात्मनः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
वृत्तं तत्पाण्डुपुत्राणां रुरुदुस्ते सगद्गदाः ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
वृत्तं प्रह्राद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् ||
५२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तं यस्य श्लाघनीय़ं मनुष्याः; सन्तो विद्वांसश्चार्हय़न्त्यर्हणीय़ाः |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तं समनुय़ात्येष धर्मात्मा भूरिदक्षिणः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
वृत्ततस्त्वविहीनानि कुलान्यल्पधनान्यपि |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
वसिष्ठ उवाच
वृत्तमेतद्यथाकालं गच्छ राज्यं प्रशाधि तत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
वृत्तमौपय़िकं मन्ये भीष्मेण सह भारत ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
वृत्तविज्ञानवान्धीरः कस्तं किं वक्तुमर्हति ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचं परं हितम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
वृत्तश्लाघी क्षत्रिय़ो व्राह्मणत्वं; स्वर्गं पुण्यं व्राह्मणः साधुवृत्तः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
वृत्तसंवर्तकौ नागौ द्वौ च पद्माविति श्रुतौ ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
वृत्ताः स्थूला रजतस्तम्भवर्णा; दंष्ट्राश्चतस्रो द्वे शते योजनानाम् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
वृत्तानि रथय़ुद्धानि कीर्त्यन्ते यत्र भागशः |
१७४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
दुर्योधन उवाच
वृत्तानि रथय़ुद्धानि विचित्राणि पदे पदे |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
वृत्तान्तमुत्तरं व्रूहि यदभाषत सञ्जय़ः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्ताभ्यामनुरूपाभ्यामूरू समवलम्वत ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
वृत्तिं च लेभिरे सर्वे पापेभ्यश्चाप्युपारमन् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
वृत्तिं विप्राय़ातिसृजेत तस्मै; यस्तुल्यशीलश्च सपुत्रदारः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
वृत्तिं हरति दुर्वुद्धिस्तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
वृत्तिः सकाशाद्वर्णेभ्यस्त्रिभ्यो हीनस्य शोभना |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
वृत्तिग्लाने सम्भ्रमे वा महार्थे; कृष्यर्थे वा होमहेतोः प्रसूत्याम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं; कृष्यर्थं वा होमहेतोः प्रसूत्याम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
वृत्तिच्छेदं गृहच्छेदं दारच्छेदं च भारत |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
वृत्तिदं चान्वपद्यन्त तृषिताः पितृमातृवत् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
वृत्तिमर्हत्युपक्षेप्तुं त्वदन्यः कुरुसत्तम ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
माद्र्यु उवाच
वृत्तिमार्ये चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा हि माम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
वृत्तिर्भरतशार्दूल नित्यं चैवान्ववेक्षणम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
वृत्ते देवासुरे युद्धे दैत्यदानवसङ्क्षय़े |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्ते विश्वजितोऽन्ते वै पाञ्चालानृषय़ोऽगमन् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रिय़ैश्चाप्यवाहिताः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
वृत्ते स्थितश्च सुश्रोणि व्राह्मणत्वं निगच्छति ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्ते स्वय़ंवरे चैव राजानः सर्व एव ते |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तेः कृपणलव्धाय़ा अप्रतिष्ठैव ज्याय़सी ||
७३ ख