उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०३
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तेनाराध्य तान्सर्वान्पतिव्रतपराय़णा |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तो व्रह्मोत्तरो रङ्गः पाञ्चाली व्राह्मणैर्वृता |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
वृत्तोरुरत्याय़तपीनवाहु; रेतेन सङ्ख्ये निहतोऽश्वचक्रः |
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
वृत्त्यर्थं धर्महेतोर्वा कामकारात्तथैव च |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
वृत्त्यर्थं धर्महेतोर्वा सेवितव्यः सदा नरैः |
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्त्यर्थं प्राद्रवन्राजन्क्षुधार्ताः सर्वतोदिशम् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्त्यर्थं फलमूलानि समाहर्तुं यय़ुः किल ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
वृत्त्यर्थं व्राह्मणानां वै शृणु तानि समाहिता ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
वृत्त्यर्थमिह सम्प्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
वृत्त्या शूद्रसमो ह्येष यावद्वेदे न जाय़ते |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्र इत्यभिविख्यातो यस्तु राजन्महासुरः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
वृत्रं तु हत्वा भगवान्दानवारिर्महाय़शाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
वृत्रं विनिहतं दृष्ट्वा देवानां भरतर्षभ ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
वृत्रं हत्वा देवराट्श्रेष्ठभाग्वै; यज्ञं हत्वा भागमवाप चैव |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
वृत्रं हत्वा यथा प्राप्तः शक्रः कौरवनन्दन ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
महेश्वर उवाच
वृत्रमेनं त्वमप्येवं जहि वज्रेण दानवम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
वृत्रवासवय़ो राजन्यथा पूर्वं तथाभवत् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
वृत्रश्च कुरुशार्दूल महामाय़ो महावलः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
श्रीवासुदेव उवाच
वृत्रश्च निहतो राजन्क्रिय़यैव न संशय़ः ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
वृत्रश्च सुमहाकाय़ो ग्रस्तुं लोकानिय़ेष यः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
वृत्रश्चावश्यवध्योऽय़ं मम सर्वहरो रिपुः ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
युधिष्ठिर उवाच
वृत्रस्तु राजशार्दूल यथा शक्रेण निर्जितः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
वृत्रस्य तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वशः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
वृत्रस्य देवाः सन्त्रस्ता न शान्तिमुपलेभिरे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
वृत्रस्य रुधिराच्चैव खुखुण्डाः पार्थ जज्ञिरे |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
वृत्रस्य वधसंय़ुक्तानुपाय़ाननुचिन्तय़न् |
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
वृत्रस्य स ततः क्रुद्धो वज्रं घोरमवासृजत् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
विष्णुरु उवाच
वृत्रस्य सह शक्रेण सन्धिं कुरुत माचिरम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
वृत्रस्योपरि संहृष्टाश्चक्रवत्परिवभ्रमुः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
वृत्रहत्यै यथा देवाः परिवव्रुः पुरन्दरम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
वृत्राद्भीतैस्तदा देवैर्वलमिन्द्रे समर्पितम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
वृत्रे विवर्धमाने च कश्मलं महदाविशत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽऽत्मनो गतिः |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता पुरा किल नराधिप |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
वृत्रो विनिर्मितो देवाः प्राप्यानुज्ञां महेश्वरात् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्रह्मो उवाच
वृथा दारान्न गच्छन्ति वृथामांसं न भुञ्जते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
वृथा मांसं न खादेत पृष्ठमांसं तथैव च |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
वृथा मांसानि खादन्ति नैष धर्मः प्रशस्यते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
वृथा शूरा न गर्जन्ति सजला इव तोय़दाः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
वृथा श्राम्यति सम्प्राप्य पतिं क्लीवमिवाङ्गना ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
वृथा सन्तोषितो वह्निः खाण्डवे सव्यसाचिना |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
वृथा सभातले क्लिष्टा मा भूदिति च तत्कृतम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते ||
६४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
वृथाग्निना समाय़ुक्तो निष्ठां प्राप्तः पिता मम ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
वृथाग्निना समाय़ोगो यदभूत्पृथिवीपतेः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
वृथाचारसमारम्भः प्रेत्य चेह च नश्यति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
वृथापशुसमालम्भं नैव कुर्यान्न कारय़ेत् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
वृथापशुसमालम्भी वनदाहस्य कारकः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
वृथाभक्षणमित्येतत्तामसं वृत्तमिष्यते ||
१९ ख