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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
वृद्धेन राज्ञा कौरव्य नष्टसञ्ज्ञा इवाभवन् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
वृद्धेन हि त्वय़ा कार्यं पुत्राणां तात रक्षणम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १३३
द्वारपाल उवाच
वृद्धेभ्य एवेह मतिं स्म वाला; गृह्णन्ति कालेन भवन्ति वृद्धाः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
वृद्धेषु कुलधर्मं च व्रुवन्पूर्वैरनुष्ठितम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
वृद्धैः संमन्त्र्य सद्भिश्च वुद्धिमद्भिः श्रुतान्वितैः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
वृद्धैर्द्विजातिभिर्गुप्ता धात्र्या चानुगता तदा |
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
वृद्धैश्च लोके पुरुषप्रवीरै; स्तस्यावमानं कलय़ा त्वं प्रय़ुङ्क्ष्व ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
वृद्धो ज्ञातिरवसन्नः कुलीनः; सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
वृद्धो ज्ञातिरवसन्नो वय़स्य; एतानि ते सन्तु गृहे सदैव ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
वृद्धो ज्ञातिस्तथा मित्रं दरिद्रो यो भवेदपि |
१०५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
वृद्धो भीष्मः शान्तनवः कृपश्च; द्रोणः सपुत्रो विदुरश्च धीमान् |
१०३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
वृद्धो राजा धृतराष्ट्रः स्वधर्मं नानुपश्यति |
११ क
विराट पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
वृद्धो ह्यहं वै परिहारकामः; सर्वान्मत्स्यांस्तरसा पालय़स्व |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
वृद्धोपसेवा दानं च शौचमुत्थानमेव च ||
८३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
पितो उवाच
वृद्धोऽहं धारय़िष्यामि त्वं वली भव पुत्रक ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
वृद्धोऽय़ं हतपुत्रोऽय़ं दुःखितोऽय़ं जनाधिपः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
वृद्धौ च तौ महेष्वासौ सापेक्षौ च धनञ्जय़े |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
वृद्धौ विराटद्रुपदौ महारथौ; पृथक्चमूभ्यामभिवर्तमानौ |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
वृद्धौ हि ते स्वः पितरौ पश्यावां दुःखितौ नृप |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
वृद्धौ हि तौ नरव्याघ्रौ छलेन निहतौ च तौ |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
वृद्ध्या कृषिवणिक्त्वेन जीवसञ्जीवनेन च |
९ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
वृद्धय़ोरन्धय़ोर्यष्टिस्त्वय़ि वंशः प्रतिष्ठितः |
८७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
वृन्तादिव फलं पक्वं धृतराष्ट्र पतन्ति ते ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
वृन्दारकं कविमर्थेष्वमूढं; महाप्रज्ञं सर्वधर्मोपपन्नम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
वृन्दारकः सुहस्तश्च सुषेणो दीर्घलोचनः |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
वृन्दारको ललित्थश्च प्रवाहुर्दीर्घलोचनः |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
वृन्दैः स्थिताश्चापि सुसम्प्रय़ुक्ता; श्चकाशिरे दन्तिगणाः समन्तात् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
वृशभैकादशफलं लभते नात्र संशय़ः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
वृषं चेमं ध्वजार्थं मे ददौ वाहनमेव च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
वृषः प्रतिष्ठितो धर्मो मनुष्येष्वभवत्पुरा ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
वृषकस्तु महाराज वहुधा परिविक्षतः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
वृषकस्य हय़ान्सूतं धनुश्छत्रं रथं ध्वजम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
वृषणः शङ्करो नित्यो वर्चस्वी धूमकेतनः |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
वृषदंशं च शैलेन्द्रं महामन्दरमेव च |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
वृषदंशमुखाश्चान्ये गजोष्ट्रवदनास्तथा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
वृषदर्पं वृषपतिं वृषशृङ्गं वृषर्षभम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
वृषध्वजाय़ पिङ्गाय़ जटिने व्रह्मचारिणे ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
वृषपर्वन्निवोधेदं त्यक्ष्यामि त्वां सवान्धवम् |
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
वृषपर्वसमीपे स शक्यो द्रष्टुं त्वय़ा द्विजः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
वृषपर्वा निववृते पन्थानमुपदिश्य च ||
२५ ग
आदि पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारय़न् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
वृषपर्वेति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
शुक्र उवाच
वृषपर्वैव तद्वेद शक्रो राजा च नाहुषः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
वृषभं च ददौ तस्मै सह ताभिः प्रजापतिः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
वृषभं ये प्रय़च्छन्ति श्रोत्रिय़ाय़ परन्तप |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
वृषभस्कन्धविक्रान्तो वृषभाक्षो नरर्षभः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय ९
सहदेव उवाच
वृषभांश्चापि जानामि राजन्पूजितलक्षणान् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ३
सहदेव उवाच
वृषभानपि जानामि राजन्पूजितलक्षणान् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
वृषभाविव गर्जन्तौ दुर्योधनवृकोदरौ |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
वृषभो वृषभस्येव यो युद्धे न निवर्तते |
११ क