आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
वृष्णींश्च पुनरागच्छेर्हय़मेधे ममानघ ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णीनां चैव दुर्धर्षाः कुमारा देवरूपिणः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णीनां त्वं कुले जाता शूरस्य दय़िता सुता |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णीनां प्रवरं वीरं शूरं सर्वधनुष्मताम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जय़ः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णीनां संमतो वीरो हार्दिक्यः प्रत्यदृश्यत ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
वृष्णीनामागमो यत्र पाञ्चालानां च सर्वशः |
१०६ क
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णीन्विनष्टांस्ते श्रुत्वा व्यथिताः पाण्डवाभवन् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
वृष्ण्यन्धकपुरे राजंस्तदा सौभसमागमे ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकमहाभोजैः संवृतः पुरुषोत्तमः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकमहामात्रैः सह वीरैर्महारथैः ||
२३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकविनाशाय़ किङ्करप्रतिमं महत् ||
१५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकविनाशाय़ मुसलं घोरमाय़सम् |
८ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकविनाशाय़ वहवो रोमहर्षणाः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
वृष्ण्यन्धका ह्युग्रसेनादय़ो वै; कृष्णप्रणीताः सर्व एवेन्द्रकल्पाः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
वृष्ण्यन्धकाः कथं पार्थ प्रमाणं भवता कृताः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
वृष्ण्यन्धकाः सुमनसो यस्य प्रज्ञामुपासते |
४ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकानां गेहेषु कपोता व्यचरंस्तदा ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकानामभवत्सुमहानुत्सवो नृप ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्ण्यन्धकाश्च वहवो भोजाश्च परमौजसः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णय़ः कृतवर्मा च आसन्कृष्णस्य पृष्ठतः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णय़ः पाण्डवान्वीरान्परिवार्योपतस्थिरे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
जनमेजय़ उवाच
वृष्णय़ः पाण्डवाश्चैव सुहृदश्च परस्परम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णय़श्च नृपाश्चान्ये नानादेशसमागताः ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णय़श्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः ||
४६ ग
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णय़ो निखिलेनान्ये समाजग्मुर्महारथाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
वृष्णय़ो भग्नसङ्कल्पा विव्यथुः पृतनागताः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णय़ो वा महेष्वासा पाञ्चाला वा महौजसः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
वृष्णय़ो वा महेष्वासाः पाञ्चाला वा महौजसः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
वृस्यस्तेषां तु संन्यस्ता राक्षसेन्द्रस्य शासनात् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
राजो उवाच
वृस्यां दर्भेषु हव्ये च कव्ये च मुनिसत्तम ||
५० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
वृहच्चैव हि तच्छास्त्रमित्याहुः कुशला जनाः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
वृहच्छरीरश्च पुनः पीवरोऽथ पुनः कृशः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
वृहच्छाल इवानूपे शाखापुष्पपलाशवान् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
वृहच्छालप्रतीकाशः प्रतप्तकनकप्रभः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहज्ज्योतिर्वृहत्कीर्तिर्वृहद्व्रह्मा वृहन्मनाः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
वृहतः सैन्धवानश्वान्समुत्थाप्य तु सारथिः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
वृहतीं धार्तराष्ट्राणां दृष्ट्वा सेनां समुद्यताम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
वृहतीमंशुमत्प्रख्यां वृहद्भानोरिवार्चिषम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वृहत्कीर्तिर्महातेजाः सञ्जज्ञे मनुजेष्विह ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
वृहत्क्षत्रं तु कैकेय़ं कृपः शारद्वतो यय़ौ |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
वृहत्क्षत्रं तु कैकेय़ं सुकुमारं हय़ोत्तमाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
वृहत्क्षत्रमथाय़ान्तं केकय़ं दृढविक्रमम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
वृहत्क्षत्रस्तु तं राजा नवत्या नतपर्वणाम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
वृहत्क्षत्रे हते राजन्केकय़ानां महारथे |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
वृहत्क्षत्रेण तत्कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
वृहत्यौ सम्प्रजह्राते देवासुरचमूपमे ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
वृहत्साम तथा साम्नां गाय़त्री छन्दसामहम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
वृहत्सेना तु तच्छ्रुत्वा दमय़न्त्याः प्रभाषितम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
वृहत्सेने पुनर्गच्छ वार्ष्णेय़ं नलशासनात् |
९ क