वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
वृहत्सेने व्रजामात्यानानाय़्य नलशासनात् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
वृहदंसोऽप्रतिवलो गौरस्ताल इवोद्गतः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
वृहदण्डमभूदेकं प्रजानां वीजमक्षय़म् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
वृहदश्व इति ख्यातो भविष्यति महीपतिः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहदश्वसुतश्चापि कुवलाश्व इति स्मृतः ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
वृहदश्वे गते पार्थमश्रौषीत्सव्यसाचिनम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहदुक्थतपस्यैव पुत्रो भूमिमुपाश्रितः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहदूर्जस्य प्रणिधिः काश्यपस्य वृहत्तरः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
वृहद्द्युम्नमुवाचेदं वचनं परिषद्गतम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहद्भानुं तु तं प्राहुर्व्राह्मणा वेदपारगाः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
वृहद्भिः कुञ्जरैर्मत्तैश्चलद्भिरचलैरिव ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
वृहद्रथ सुतस्तेऽय़ं मद्दत्तः प्रतिगृह्यताम् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहद्रथन्तरं मूर्ध्नो वक्त्राच्च तरसाहरौ |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वृहद्रथात्क्रमेणैव प्राप्तो वार्हद्रथं नृपम् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
वृहद्रथो नरपतिः परां निर्वृतिमाय़यौ ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
वृहद्रथो महावाहुर्भुवि भूतिपुरस्कृतः |
७३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
वृहद्रथो वाह्लिकश्च श्रुताय़ुश्च महारथः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
वृहद्वलं च राजानं स्वर्गेणाजौ प्रय़ोज्य ह |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलं च सौभद्रो विद्ध्वा नवभिराय़सैः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलं महाराज विव्याध नवभिः शरैः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलः कृतवर्माभिगुप्तो; वलं त्वदीय़ं दक्षिणतोऽभिपाति ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
वृहद्वलः सुषेणश्च शिविरौशीनरस्तथा ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वृहद्वलश्च काशीशः शकुनिश्चापि सौवलः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलश्च कौशल्यः कृतवर्मा च सात्वतः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलश्च कौसल्यश्चित्रसेनो विविंशतिः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलसमुच्चालं सौमदत्तितिमिङ्गिलम् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
वृहद्वलस्तथा राजा कौसल्यो रथसत्तमः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलस्तथाष्टाभिरश्वत्थामा च सप्तभिः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलस्तु पञ्चाशत्कृपः शारद्वतो दश ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलात्ततः शूरस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलेन सहिता वामं पक्षमुपाश्रिताः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलो मद्रराजो भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
वृहद्वलो महौजाश्च वाहुः परपुरञ्जय़ः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वृहद्वलो हतो यत्र मागधश्च महावलः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
वृहद्व्रह्म महच्चेति शव्दाः पर्याय़वाचकाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्त इति विख्यातः क्षितावासीत्स पार्थिवः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्तं धर्ममाप्नोति स वुद्ध इति निश्चितः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्तं सर्वगं देवमीशानं वरदं प्रभुम् ||
५० ग
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्तं सोमदत्तं च सृञ्जय़ांश्च शताधिकान् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
वृहन्तस्तु महेष्वासः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
वृहन्तो मणिमांश्चैव दण्डधारश्च वीर्यवान् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडा यस्य यन्ता कथं स न विजेष्यति ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडा सारथिश्चेन्नरेन्द्र; परे न नेष्यन्ति तवाद्य गास्ताः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडां तामभिवीक्ष्य मत्स्यरा; ट्कलासु नृत्ते च तथैव वादिते |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
१०
अर्जुन उवाच
वृहन्नडां वै नरदेव विद्धि मां; सुतं सुतां वा पितृमातृवर्जिताम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वृहन्नडो उवाच
वृहन्नडापि कल्याणि दुःखमाप्नोत्यनुत्तमम् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडासहाय़श्च निर्यातः पृथिवीञ्जय़ः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडासहाय़स्ते पुत्रो द्वार्युत्तरः स्थितः ||
५० ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडासारथिमाजिवर्धनं; प्रोवाच सर्वानथ मन्त्रिमुख्यान् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडे आनय़ेथा वासांसि रुचिराणि नः ||
२२ ख