विराट पर्व
अध्याय
२३
सैरन्ध्र्यु उवाच
वृहन्नडे किं नु तव सैरन्ध्र्या कार्यमद्य वै |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
उत्तर उवाच
वृहन्नडे गाय़नो वा नर्तनो वा पुनर्भव |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नडेति विख्यातः पार्थस्यासीत्स सारथिः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
वृहन्नामाष्टमस्तेषां कालेय़ानां परन्तपः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहन्मन्त्रो वृहद्भासस्तथा राजन्वृहस्पतिः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
वृहन्मूलो वृहच्छाखः स त्वां वाय़ोऽवमन्यते ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
वृहस्पतिं गतः पूर्वमहं संवर्त तच्छृणु |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
वृहस्पतिं तु वव्रे स वेदवेदाङ्गभाष्यवित् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
वृहस्पतिं त्वमुपशिक्षस्व राज; न्वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
वृहस्पतिं देवगुरुं सुरासुराः; समेत्य सर्वे नृपतेऽन्वय़ुञ्जन् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
वृहस्पतिं देवपतिरभिवाद्य कृताञ्जलिः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
वृहस्पतिं याजकं त्वं वृणीष्व; वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
वृहस्पतिं वसुमना यथा पप्रच्छ भारत ||
२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिं विवेशाथ द्रोणो ह्यङ्गिरसां वरम् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिं वृहत्तेजाः पुरुहूत इवारिहा ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिं सभाज्येदं कचमाहुर्मुदान्विताः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
वृहस्पतिः प्रश्नमिमं पुराणं; पप्रच्छ शिष्योऽथ गुरुं प्रणम्य ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिः समिद्धेऽग्नौ जुहावाज्यं यथाविधि ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
वृहस्पतिनिकेतं सा जगाम च तपस्विनी ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिपुरोगांश्च देवर्षीनसकृत्प्रभुः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
वृहस्पतिप्रभृतिभिर्मन्ये सद्भिः कृतानि वै ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
वृहस्पतिभरद्वाजौ गौतमो भार्गवस्तथा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
वृहस्पतिमते चैव लोकेषु प्रविचारिते ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
वृहस्पतिमथोवाच प्रीतिमान्वाक्यमुत्तमम् |
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
वृहस्पतिमुपागम्य वाग्मी वचनमव्रवीत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
वृहस्पतिरथाविन्दत्तां पत्नीं तस्य भारत ||
४४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
वृहस्पतिरथोवाच अग्निवेश्याय़ धीमते ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
वृहस्पतिरथोवाच इन्द्राणीं भय़मोहिताम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
वृहस्पतिरुतथ्यश्च वय़स्यः शान्तिरेव च ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिरुतथ्यश्च संवर्तश्च धृतव्रताः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
वृहस्पतिरुपाध्याय़स्तत्र होता वभूव ह ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहस्पतिर्मन्त्रविधिं जजाप च जुहाव च ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
वृहस्पतिर्महातेजा देवराजोपलव्धय़े ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
वृहस्पतिर्महातेजाः प्रत्युवाच शतक्रतुम् ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
वृहस्पतिर्याजय़िता महेन्द्रं; देवश्रेष्ठं वज्रभृतां वरिष्ठम् |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिर्वा देवेषु शुक्रो वाप्यसुरेषु यः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
वृहस्पतिर्वृहत्तेजा ममतां सोऽन्वपद्यत ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
वृहस्पतिर्वृहत्तेजाः संवर्तश्च तपोधनः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
वृहस्पतिर्व्रह्मचर्यं चचार; समाहितः संशितात्मा यथावत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
वृहस्पतिर्हि भगवान्नान्यं धर्मं प्रशंसति ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
वृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रो विगतमत्सरः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
वृहस्पतिश्च ताराय़ां शुक्रश्च शतपर्वय़ा ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिश्च पप्रच्छ व्राह्मणं काविमाविति |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिश्च भगवानादित्येष्वेव गण्यते ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
वृहस्पतिश्च शुक्रश्च तस्यामाय़यतुः सह ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
वृहस्पतिश्च संवर्तं वाधते स्म पुनः पुनः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिश्चोशना च व्रह्माणं पर्युपस्थितौ |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
वृहस्पतिसकाशाद्वै प्राप्स्यते द्विजसत्तमाः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
जनमेजय़ उवाच
वृहस्पतिसमं वुद्ध्या क्षमय़ा पृथिवीसमम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिसमं वुद्ध्या क्षमय़ा व्रह्मणः समम् |
१ क