chevron_left  वृहस्पतिसमाarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिसमा मुख्याः प्रजापतिमिवामराः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
वृहस्पतिसमो वुद्ध्या भवाञ्शंसितुमर्हति ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
वृहस्पतिसमो वुद्ध्या हिमवानिव सुस्थिरः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
वृहस्पतिसवेनेष्ट्वा सुरापो व्राह्मणः पुनः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
वृहस्पतिस्ततः क्रुद्धः स्रुवमुद्यम्य वेगितः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
व्यास उवाच
वृहस्पतिस्तु तां श्रुत्वा मरुत्तस्य महीपतेः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
वृहस्पती रोहिणीं सम्प्रपीड्य; वभूव चन्द्रार्कसमानवर्णः ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
अग्निरु उवाच
वृहस्पते न पश्यामि देवराजमहं क्वचित् |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
वृहस्पते मरुत्तस्य मा स्म कार्षीः कथञ्चन |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
शुक्र उवाच
वृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
वृहस्पतेरङ्गिरसश्चुक्रोध स नृपस्तदा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
वृहस्पतेर्भगवतः पूष्णश्चैव भगस्य च |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
वृहस्पतेर्मतं राजन्नधीतं सकलं त्वय़ा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतेर्वृहत्कीर्तेर्देवर्षेर्विद्धि भारत |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
वृहस्पतेर्वृहत्कीर्तेर्वृहस्पतिरिवौजसा ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतेश्च देवेशः प्रददौ विपुलं धनम् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
वृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च भारत ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८५
भीष्म उवाच
वृहस्पतेश्च संवादं शक्रस्य च युधिष्ठिर ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
वृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
वृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
वृहस्पतेश्चान्द्रमसी भार्याभूद्या यशस्विनी |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री व्रह्मचारिणी |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
वृहस्पत्युशनस्तुल्यो वुद्ध्या स निहतः कथम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पत्युशनोक्तैश्च नय़ैर्धार्यन्ति मानवाः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पत्युशनोक्तैश्च मन्त्रैर्मन्त्रविशारदाः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
वेगं कुर्वन्ति संरव्धा निकृत्ताः परमेषुभिः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
वेगं चक्रे महावेगः क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
वेगं चक्रे महावेगो भीमसेनवधं प्रति ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
वेगं तु मम दुर्धार्यं पतन्त्या गगनाच्च्युतम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
वेगं वेगवतो राजंस्तस्थौ वीरो विधारय़न् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
वेगं समर्थाः संसोढुं वज्रस्येव महीधराः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
वेगवत्या तय़ा तत्र भीमसेनप्रमुक्तय़ा |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
वेगवत्समरे घोरं शरांश्चाशीविषोपमान् ||
३३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
वेगवद्गृह्य चिक्षेप पितामहरथं प्रति ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
वेगवद्भिर्हय़ैस्तैस्तु क्षोभितं पाण्डवं वलम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
वेगवन्तं महारौद्रं विद्युज्जिह्वं प्रमाथिनम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
वेगवान्नाम दैतेय़ः सुतं मेऽभ्यद्रवद्वली ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
वेगांश्चान्ये रणे चक्रुः स्फुरन्त इव पन्नगाः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
वेगान्वहुविधांश्चक्रे विषं पीत्वेव मानवः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
वेगेन गामाविविशुः सुवेगाः; स्नात्वा च कर्णाभिमुखाः प्रतीय़ुः ||
३८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
वेगेन त्वरिता जग्मुर्हरय़ः शीघ्रगामिनः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
वेगेन प्रहृतं वाहुं निजग्राह हसन्निव ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
वेगेन महता गच्छद्विक्षिप्तं द्रौणिना शरैः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
वेगेन महता पार्थ पतन्नाराय़णोरसि ||
४४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
वेगेन महता राजंश्चेकितानमुपाद्रवत् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
वेगेन महता राजन्पर्वकाले यथोदधिः ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
वेगेन महता राजन्संन्यवर्तन्त सर्वशः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
वेगेन महतान्योन्यं संरव्धावभिपेततुः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
वेगेन सातीव पृथुप्रवाहा; प्रसुस्रुता भैरवारावरूपा |
१२२ क