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आदि पर्व
अध्याय २५
सूत उवाच
नखेन गजमेकेन कूर्ममेकेन चाक्षिपत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
नखैरिव महाव्याघ्रौ दन्तैरिव महागजौ |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
नखैर्दन्तैरय़ुध्यन्त मुष्टिभिर्जानुभिस्तथा ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
नखैर्दन्तैश्च वीराणां खादतां वै परस्परम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
नखैर्दन्तैश्च शूराणमद्वीपे द्वीपमिच्छताम् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
नखैश्च दशनैश्चैव गरुडः पन्नगं यथा ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
नगमात्रैर्महाघोरैस्तन्मां दृढमपीडय़त् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
नगमेघप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव च श्रिय़ा ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
नगमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विष्ठिता |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
नगमेघप्रतीकाशां ज्वलन्तीमिव तेजसा |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
नगमेघप्रतीकाशाः पातिता वहुधा गजाः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
नगमेघप्रतीकाशाश्चाक्षिप्य तुरगान्गजाः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
नगमेघप्रतीकाशैर्जलदोदय़निस्वनैः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं खाण्डवप्रस्थं रत्नान्यादाय़ सर्वशः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
नगरं चैव देशं च रक्षोवलसमन्वितः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
अर्जुन उवाच
नगरं ते मय़ा गुप्तं रथोपस्थं भविष्यति ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं धार्तराष्ट्रस्य भारतासीत्समाकुलम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं न यथापूर्वं तथा राजनिवेशनम् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं मत्स्यराजस्य शुशुभे भरतर्षभ ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं मापय़ामासुर्द्वैपाय़नपुरोगमाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं राजमार्गश्च यथावत्समलङ्कृतम् ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
नगरं विषय़श्चास्य प्रतिपूर्णं तदाभवत् ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं हास्तिनपुरं पुनराय़ात्सवान्धवः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं हास्तिनपुरं शनैः प्रविविशुस्तदा ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
नगरं हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
नगरागारवप्रेषु वहिर्माल्यानुलेपनाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
नगराणीव गुप्तानि दुरादेय़ानि शत्रुभिः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
नगरादपि याः काश्चिद्गमिष्यन्ति जनार्दनम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
नगराद्धास्तिनपुराद्वलसङ्ख्यानमेव च ||
१४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
नगराद्रिवनप्रख्यस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
१०१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
नगराधिकृतानां च गृहाणि रथिनां तथा |
७ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
नगरीं सञ्जय़न्तीं च पिच्छण्डं करहाटकम् |
४७ ख
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
नगरे कुण्डिने कालं नातिदीर्घमिवावसत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
नगरे नगरे च स्यादेकः सर्वार्थचिन्तकः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
नगरे प्रतिरुद्धः सन्वहिर्द्वारे वुभुक्षितः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैर्नगरवासिभिः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
नगरे प्रिय़माख्यातुं घोषय़न्तु च ते जय़म् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
नगरे शाकले स्फीते आहत्य निशि दुन्दुभिम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
नगरोपवने चैव पुरोद्यानेषु चैव ह ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
नगशाखाग्रहस्तिष्ठंस्तस्याहं भृशमुद्विजे ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
नगृहीतमनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
नगोत्तमं प्रस्रवणैरुपेतं; दिशां गजैः किंनरपक्षिभिश्च |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
नग्नस्य स्नाय़मानस्य या च वन्ध्यातिथेर्गतिः |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
नचिरं च हतस्तस्य सङ्ग्रामे रथसारथिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
नचिरादिव विद्वांसो वेदे धनुषि चाभवन् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
नचिराद्विनशिष्यन्ति दैत्या इव न संशय़ः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
कण्व उवाच
नचिराद्वैनतेय़ेन पञ्चत्वमुपपादितः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
नचिरेण प्रिय़ः स स्याद्योऽप्रिय़ः प्रिय़माचरेत् ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
नटनर्तकलास्याढ्यं वह्वन्नरसदक्षिणम् ||
१६ ख