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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
शरीरमात्मनः कृत्वा सर्वभूतपितामहः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
राम उवाच
शरीरमात्रमेवाद्य मय़ेदमवशेषितम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १५४
राम उवाच
शरीरमात्रमेवाद्य मय़ेदमवशेषितम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
युधिष्ठिर उवाच
शरीरमापदश्चापि विवदन्त्यविहिंसतः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
शरीरमिह सत्त्वेन नरस्य परिकृष्यते |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
शरीरमुत्सृजेत्तत्र विधिपूर्वमनाशके |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
शरीरमेतत्कुरुते यद्वेदे कुरुते तनुम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
शरीरमेतौ कुरुतः पिता माता च भारत |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
शरीरमेतौ सृजतः पिता माता च भारत |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
शरीरमेतौ सृजतः पिता माता च भारत |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
शरीरमेवाय़तनं सुखस्य; दुःखस्य चाप्याय़तनं शरीरम् ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरलिङ्गैरुपसूचितो ह्ययं; मूर्धाभिषिक्तोऽय़मितीव मानसम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
व्यास उवाच
शरीरवांस्तानि कुर्यादशरीरः पराभवेत् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
शरीरवानुपादत्ते मोहात्सर्वपरिग्रहान् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
शरीरविचय़ं ज्ञातुं वुद्धिस्तु मम जाय़ते ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
शरीरशतसम्वाधां केशशैवलशाद्वलाम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
शरीरशुद्धिः स्नातस्य तस्मिंस्तीर्थे न संशय़ः |
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
शरीरसङ्घाटवहा असृग्जला; रथोडुपा कुञ्जरशैलसङ्कटा |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शरीरसङ्घातसहस्रवाहिनी; विशीर्णनानाकवचोर्मिसङ्कुला ||
१२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय़ न करोति न लिप्यते ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
शरीरस्य यथा राजन्वातपित्तकफैस्त्रिभिः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
शरीरस्य विमोक्षेण मुच्यते कर्मणोऽशुभात् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरस्यापि नाशेन धर्म एव विशिष्यते ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
शरीरस्याविरोधेन प्राणिनां प्राणभृद्वर |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
शरीराणामजस्याहुर्हंसत्वं पारदर्शिनः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
शरीराणामुपक्लेशो मनसश्च प्रिय़ाप्रिय़े |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
शरीराणि विमोक्ष्यामस्तपसोग्रेण सत्तम |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शरीराणि व्यदृश्यन्त हतानां च महीतले |
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
शरीराण्यशिरस्कानि विदेहानि शिरांसि च ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
शरीरादीनि देय़ानि पिता त्वेकः प्रय़च्छति ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
शरीराद्विप्रमुक्तं हि सूक्ष्मभूतं शरीरिणम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
शरीराद्विविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन्नृप ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
शरीरान्तकरो नॄणां यमोऽय़मपि पार्थिव ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
शरीरान्निःसृतस्तस्य को भवानिति चाव्रवीत् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
शरीरान्निःसृतस्तस्य प्रह्रादस्य महात्मनः ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
शरीरार्धं च मे विप्राः शातकुम्भमय़ं कृतम् |
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
शरीराश्रय़णं प्राप्तास्ततः पुरुष उच्यते ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
शरीरिणा परित्यक्तं निश्चेष्टं गतचेतनम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
शरीरिणां हि मरणं शरीरे नित्यमाश्रितम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
शरीरे जाय़ते व्याधिः शारीरो नात्र संशय़ः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
शरीरे जीविते चैव तृष्णा मन्दस्य वर्धते ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
शरीरे तु न पश्यामि तव चैवात्मनश्च ह |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
शरीरे प्राणिनां जीवं ज्ञातुमिच्छामि यादृशम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
शरीरे सोमदत्तस्य स पपात महारथः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
शरीरेण महाभागा योगो ह्यस्या वशे स्थितः ||
८३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
शरीरेणासमग्रोऽद्य तस्माद्दासी भविष्यसि ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ||
८ ख