शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
व्यजय़न्त रणे शत्रून्हर्षय़न्तो जनेश्वरम् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यजय़ल्लोहितं चैव मण्डलैर्दशभिः सह ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महार्हाणां सहस्रशः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
व्यतिक्रमं मे भगवन्क्षन्तुमर्हसि शङ्कर ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
व्यतिक्रममिमं मन्ये धर्मराजस्य केशव |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
व्यतिक्रममिमं राजन्सङ्क्षमस्वार्जुनं प्रति ||
११० ख
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
व्यतिक्रमोऽय़ं सुमहांस्त्वय़ा राजन्नुपेक्षितः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समय़े गमनस्य च |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
गौतम उवाच
व्यतिक्रामन्महान्कालो नाववुद्धो द्विजर्षभ ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यतिमिश्रमजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
व्यतिरिक्तं तमो यत्र तिर्यग्भावगतं भवेत् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
व्यतिषक्तं महारौद्रं युद्धं भीरुभय़ावहम् ||
१९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
व्यतिष्ठत तदा युद्धे सिन्धोर्वेग इवाचलम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
व्यतिष्ठदेकपादेन परमं योगमास्थिता |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
व्यतिष्ठन्वागुराकाराः शतशोऽथ सहस्रशः ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यतिष्ठन्वै मुहूर्तं तु व्यूढानीकाः प्रहारिणः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
व्यतिष्ठमग्निहोत्रे च चिरमङ्गिरसो भय़ात् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
व्यतीतं तदहःशेषं सा चोग्रा तत्र शर्वरी ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यतीतः समय़ः सम्यग्वसतां वै पुरोत्तमे |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
व्यतीतः सुमहान्कालो न चाश्वः समदृश्यत ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४४
भीष्म उवाच
व्यतीता सा निशा कृत्स्ना सुखेन दिवसोपमा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
व्यतीतां रजनीं कृत्स्नां नाजानात्स महाव्रतः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यतीताय़ां तु शर्वर्यां कृतपूर्वाह्णिकक्रिय़ः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
व्यतीताय़ां तु शर्वर्यां पुनर्युद्धाय़ निर्ययुः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
व्यतीताय़ां रजन्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
व्यतीत्य रथिनश्चापि द्रोणानीकमुपाद्रवत् ||
१०५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यतीत्य विविधान्देशांस्त्वरावान्क्षिप्रवाहनः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
व्यतीय़ुर्व्राह्मणश्रेष्ठ शूराणामरिघातिनाम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
व्यत्यचेष्टन्त संहत्य गजा भीमस्य नर्दतः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
व्यत्ययो ह्ययमत्यन्तं पक्षय़ोः शुक्लकृष्णय़ोः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
व्यत्यरिच्यत रूपेण दिवाकर इवापरः ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
व्यत्यासं वृक्षय़ोश्चापि करवाव शुचिस्मिते |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
व्यत्यासः पादपे चापि सुव्यक्तं ते कृतः शुभे ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात्त्वय़ा मात्रा तथैव च |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
व्यत्यासेनोपय़ुक्तस्ते चरुर्व्यक्तं भविष्यति |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
व्यत्रस्यन्त रणे योधाः कालस्येव युगक्षय़े ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
व्यथां जहि सुवुद्ध्या त्वं स्वय़ं यास्यामि तत्र वै ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
व्यथितं वह्निवद्राजन्व्रह्माणमिदमव्रवीत् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यथितः कर्म तत्कृत्वा शोकोपहतचेतनः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यथितां मां च सम्प्रेक्ष्य पितृवंशं च पीडितम् |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यथिताः परमोद्विग्ना नाधिजग्मुः पराय़णम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
व्यथिताः पाण्डवा दृष्ट्वा न चैनं पर्यवारय़न् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
व्यथिताः सर्वराजानस्तदा ह्यासन्विचेतसः |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यथितात्माभवद्द्रौणिः प्राप्तं चेदममन्यत ||
१६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
व्यथिताश्चिन्तय़ामासुः किं स्विदेतद्भविष्यति ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
व्यथितोऽस्मि महाय़ुद्धे भय़ं चागान्महन्मम ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यथय़न्ति स्म चेतांसि सुहृदां भरतर्षभाः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
व्यथय़न्निव भूतानि कम्पय़न्निव मेदिनीम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
व्यथय़ेद्धि स राजानं मन्त्रिभिः सहितोऽनृजुः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
व्यथय़ेय़ुरिमे सेनां देवानामपि संय़ुगे |
१ क