अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
व्रह्मो उवाच
निवत्स्यन्ति महाभागे सर्वा दुहितरश्च ते ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
निवद्धासितलत्राणः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ||
३२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
निवध्नन्ति महावाहो देहे देहिनमव्ययम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
निवध्यतां मे कवचं विचित्रं; हैमं शुभ्रं मणिरत्नावभासि |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
निवन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
निवन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
निवन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
निवन्धनी ह्यर्थतृष्णेह पार्थ; तामेषतो वाध्यते धर्म एव |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
निवपन्पूजय़ंश्चैव तेष्वानृण्यं निगच्छति ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
निवप्ते चाग्निपूर्वे वै निवापे पुरुषर्षभ |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
निवर्त गच्छ सावित्रि कुरुष्वास्यौर्ध्वदेहिकम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
निवर्त तुष्टोऽस्मि तवानय़ा गिरा; स्वराक्षरव्यञ्जनहेतुय़ुक्तय़ा |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्ततां च शव्दोऽभूत्पूर्णस्येव महोदधेः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
निवर्ततागता दूरं समागमनशापिताः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
निवर्तते चापि पुनः कथमैश्वर्यमुत्तमम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
निवर्तते तथा तर्षः पापमन्तं गतं यथा ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
निवर्तते तु लक्ष्मीवान्नालक्ष्मीवान्निवर्तते ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
निवर्तते सदामर्षात्सिंहात्क्षुद्रमृगो यथा ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तध्वमधर्मज्ञा यदि स्थ न मुमूर्षवः |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तध्वमधर्मज्ञाः श्रेय़ो जीवितमेव वः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
निवर्तनं च तत्रास्य त्रीणि पद्मानि वै विदुः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
निवर्तनाद्धि सर्वतो न वेत्ति दुःखमण्वपि ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तनाय़ैव मनो निदध्यु; र्दुर्योधनं ते परिरक्षमाणाः ||
२४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तने धृतमनाः पर्यावर्तत भारत ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
निवर्तन्ते निवृत्तौ च सर्गं नैवोपय़ान्ति च ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तमानः सहसा जनं दृष्ट्वाश्रमं प्रति ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
निवर्तमाने तिग्मांशौ हृष्टैः पीतोदकैर्हय़ैः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
निवर्तमाने सौहार्दे प्रीतिर्नीचे प्रणश्यति |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
निवर्तमानेन मय़ा महद्दृष्टं ततोऽपरम् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
निवर्तस्व कुरुश्रेष्ठ भीमसेनादिभिः सह |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
तक्षक उवाच
निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मय़ा दष्टं चिकित्सितुम् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तस्व महावाहो कुरुष्व वचनं मम |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
निवर्तस्व महावाहो नानृतं कर्तुमर्हसि |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
निवर्तस्व महीपाल नैतज्जात्वन्यथा भवेत् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
निवर्तस्व रणात्तात मानय़स्व द्विजोत्तमान् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
निवर्तस्व रणादस्मादिति चैव प्रचोदितः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
निवर्तस्व विवित्साभ्यः शाम्य निर्विद्य मामक |
१८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तितव्यं हि मय़ा तथास्म्युक्तो दिवौकसैः |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तितस्तस्य गिराङ्कुशेन; गजो यथा मत्त इवाङ्कुशेन ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
निवर्तिताः स्युः संरव्धा न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
निवर्तितेषु सस्येषु यस्मै शान्तां ददौ नृपः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
धृतराष्ट्र उवाच
निवर्तितेषु सैन्येषु द्रोणपुत्रेण संय़ुगे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
निवर्तिष्यति राधेय़ इति मामुक्तवान्वृषः ||
७३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
निवर्तिष्यन्ति सम्भ्रान्ताः सिंहं क्षुद्रमृगा इव ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
निवर्तिष्यामहे सर्वे हता वा स्वर्गगा वय़म् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
निवर्तिष्ये रणात्सूत सत्यमेतद्वचो मम ||
२ ख