शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
व्यराजतामलं चैव नभो वैडूर्यसंनिभम् ||
५३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यराजन्त द्विजश्रेष्ठैस्तत्र तत्र तपोधनैः |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
व्यराजन्त महाराज नक्षत्रपतय़ो यथा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
व्यराजन्त महाराज प्रदीपैरवभासिताः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
व्यराजन्त महाराज सुपर्णा इव खेचराः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
व्यराजेतां महाराज कण्टकैरिव शाल्मली ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
व्यराजय़न्दश दिशो वैय़ाघ्रैर्हेमचन्द्रकैः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचत कुरुश्रेष्ठः सात्वतप्रवरं युधि ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचत द्रोणसुतः प्रतापवा; न्यथा सुरेन्द्रोऽरिगणान्निहत्य ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचत महाराज त्रिशृङ्ग इव पर्वतः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यरोचत यथा पूर्वं मान्धाता पार्थिवोत्तमः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचत यथा वह्निर्दावं दग्ध्वा हिमात्यये ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचत रणे भीमः सविद्युदिव तोय़दः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचत रणे राजन्धृष्टद्युम्नः कृतव्रणः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचतां महाभागौ वालसूर्याविवोदितौ ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचन्त रणे राजन्दीप्यमाना यशस्विनः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यरोचन्महिषाकीर्णं राज्ञा हतमहामृगम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचेतां महात्मानौ वृत्रवज्रधराविव ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
व्यरोचेतां महारङ्गे निस्त्रिंशवरधारिणौ |
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यरोचय़ः पुरा ह्यस्मानुत्साह्य प्रिय़दर्शने |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
व्यर्थं तद्भवतो मन्ये शौर्यं सलिलशाय़िनः ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
व्यर्थं भवति सर्वत्र पूर्वं कस्तत्र निश्चय़ः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
व्यर्थः कथं समभवत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
व्यर्था जातिस्तदाय़ुष्मन्कृतिर्यावन्न दृश्यते ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
व्यर्थान्निपततः सङ्ख्ये दुर्योधनरथं प्रति ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यलीकं कृतपूर्वं मे प्राज्ञेनामितवुद्धिना ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यलीकं चापि यत्त्वत्र चित्तवैतंसिकं तव |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
व्यलीकं पाण्डवेय़ेन भीमसेनानुजेन ह |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
व्यलीकानामकरणं भूतानां यत्र सा भुवि ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यलोकय़दमेय़ात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिशः |
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
व्यवधावेत्ततस्तूर्णं ससर्पाच्छरणादिव ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यवर्धत यथा शुक्ले तारापतिरिवाम्वरे ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवर्धन्कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
व्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलिः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवसाय़ं करिष्येऽहमनुनीय़ पितामहम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
व्यवसाय़ं च पुत्रास्ते प्रैक्षन्त कुरुभिः सह ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
व्यवसाय़ं तय़ोस्तत्र विदित्वा त्रिदशेश्वरः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
व्यवसाय़ं समाधाय़ सूर्यो रश्मिमिवाय़ताम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
व्यवसाय़ं समाश्रित्य सहाय़ान्योऽधिगच्छति |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२८०
सावित्र्यु उवाच
व्यवसाय़कृतं हीदं व्यवसाय़श्च कारणम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
व्यवसाय़गुणोपेता तदा सम्पद्यते मनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
व्यवसाय़द्वितीय़ोऽहं मनसा भारमुद्वहन् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
व्यवसाय़श्च यस्य स्यात्तस्यावृत्तिभय़ं कुतः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवसाय़सहाय़स्य विष्णोः शत्रुवधेष्विव ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
व्यवसाय़स्तय़ोः शीघ्रमुभय़ोरेव विद्यते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
व्यवसाय़ात्ततस्तेजो जागर्ति परिपालय़न् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
व्यवसाय़ात्मिका वुद्धिः समाधौ न विधीय़ते ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
व्यवसाय़ात्मिका वुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४४
व्यास उवाच
व्यवसाय़ात्मिका वुद्धिर्मनो व्याकरणात्मकम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
व्यवसाय़ादृते व्रह्मन्नासादय़ति तत्परम् ||
४७ ख