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शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
व्यसुः पपात मेदिन्यां ततो धात्री विचुक्रुशे ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
व्यसुरप्रेक्षणीय़ापि प्रेक्षणीय़तमाकृतिः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
व्यसुश्चाप्यपतद्भूमौ प्रेक्षतां सर्वधन्विनाम् ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजंश्च सुगन्धीनि नानारूपाणि खात्तथा |
६० क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसृजच्छतधा राजन्मय़ूखानिव भास्करः ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्राह्मणा ऊचुः
व्यसृजञ्ज्वलितानग्नीन्कपानां प्राणनाशनान् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजञ्शरवर्षाणि पार्थे नानाविधानि च ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
व्यसृजत निय़तात्मवान्द्विजेभ्यः; सुवहु च गोधनमाप्तवांश्च लोकान् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्तं महाज्वालं सङ्क्रुद्धमिव पन्नगम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
व्यसृजत्तव पुत्रस्य त्वरमाणः स्तनान्तरे ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्तोमरान्मूर्ध्नि श्वेताश्वस्योन्ननाद च |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्सात्वते द्रौणिर्वज्रं वृत्रे यथा हरिः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्साय़कं तीक्ष्णं केकय़ं प्रति भारत ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्साय़कांश्चैव स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् ||
२२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्साय़कांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्साय़कांस्तूर्णं स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यसृजत्साय़कान्भूय़ः शतशोऽथ सहस्रशः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
व्यसृजद्दिक्षु सर्वासु महेन्द्र इव वज्रभृत् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजद्वज्रसङ्काशाञ्शरानाशीविषोपमान् |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजद्वासुदेवाय़ द्विधा तामर्जुनोऽच्छिनत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजद्विशिखांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजन्त शरौघांस्ते पाण्डवं प्रति पार्थिवाः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजन्नर्जुने राजन्संशप्तकमहारथाः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
व्यसृजन्निषुजालानि नानालिङ्गानि सङ्घशः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
व्यस्ता सीमन्तिनी त्रस्ता प्रमृष्टा दीर्घवाहुना ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यस्ते काले पुनश्चैति न चैति वहुशो द्विजः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
व्यस्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
व्यस्फूर्जय़च्च गाण्डीवं सुमहद्भैरवस्वनम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यस्मय़न्त ततो योधाः सर्वे तत्र समागताः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
व्यस्मय़न्त महाराज न चैनं प्रतिवीक्षितुम् |
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
व्यहनत्कार्मुकं राजा तूणीरं चैव सर्वशः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
व्यहनत्पाण्डवीं सेनामासुरीमिव वृत्रहा ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
व्यहनत्स पदात्योघांस्त्वदीय़ानेव भारत ||
४० ग
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
व्यहनत्साय़कै राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
८८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
व्यहसन्त रणे योधाः सिद्धाश्चाप्सरसां गणाः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
व्याकुलं तदभूत्सर्वं पाण्डवानां परैः सह |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
व्याकुलं मे मनस्तात श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |
१०८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
व्याकुलं सर्वमभवत्पाण्डवानां महद्वलम् ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय ४१
उत्तर उवाच
व्याकुलाश्च दिशः सर्वा हृदय़ं व्यथतीव मे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
व्याकुलीकृतमाचार्यं पिपीलैरुरगं यथा |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
व्याकुलीकृतसङ्कल्पा युय़ुधुस्तत्र मानवाः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
व्याकुलीकृत्य तं द्रोणो वृहत्क्षत्रं महारथम् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
व्याकुले समपद्येतां वर्षासु सरिताविव ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
व्याकुलेनाकुलः सर्वो भवतीति विनिश्चय़ः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
व्याकोशपद्माभमुखं नीलो विव्याध साय़कैः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
व्याकोशपद्माभिमुखं व्याघ्रास्यं मेरुगौरवम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
व्याकोशमिव विस्पष्टं पद्मं सूर्यविवोधितम् ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्याक्रोशन्क्षत्रिय़ाः सर्वे धृष्टद्युम्नस्य भारत ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
व्याक्रोशन्त रणे तत्र वीरा वहुविधं वहु |
२६ ख