सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
व्याजहारोत्तरं तत्र सहदेवोऽर्थवद्वचः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
व्याजेन कृत्स्नो विदितो धर्मस्ते परिहास्यते |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
व्याजेन चरतो धर्ममर्थव्याजोऽपि रोचते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
व्याजेन विन्दन्वित्तं हि धर्मात्तु परिहीय़ते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
व्याजेन सिध्यमानेषु धनेषु कुरुनन्दन ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
व्याजेन सिध्यमानेषु धनेषु द्विजसत्तम |
६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
व्याजेन हि त्वय़ा द्रोण उपचीर्णः सुतं प्रति |
१४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
व्याजेनैव ततो राजन्दर्शितो नरकस्तव ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
व्याडस्य भक्तिचित्रस्य यच्छ्रेष्ठं तत्समाचरेत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
व्याढानीकं वय़ं द्रोणं वरय़ामः स्म सर्वशः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
व्यात्ताननस्यापततो यथैव; कालस्य काले हरतः प्रजा वै ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
व्यात्तानना भय़करा उरगा इव सङ्घशः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
व्यात्ताननो घोरदृष्टिर्ग्रसन्निव जगद्वलात् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
व्यात्ताननो यथा कालस्तव सैन्यं जघान ह ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
व्यादितास्यः क्षुधाभग्नः प्रार्थय़ानस्तदामिषम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
व्यादितास्या महारौद्रा विनदन्तोऽतिभीषणाः ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यादितास्यैर्महानादैः सह भूतैर्ध्वजालय़ैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
व्यादिदेश ततः सैन्यं तस्मिंस्तमसि दारुणे ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
व्यादिदेश महाराज रथिनो रथिनां वरः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
व्यादिदेश सवाह्यानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
व्यादिदेश स्वसैन्यानि स्वय़ं चागाच्चमूमुखम् ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यादिदेशाथ तां क्षिप्रं वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यादिदेशानुय़ात्रं च गम्यतामित्यचोदय़त् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
व्यादिदेशान्नपानानि शय़्याश्चाप्यतिमानुषाः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यादिशन्तु च किं विप्राः प्राय़श्चित्तमिहाद्य मे |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यादिष्टा दैवतैः शूराः स्कन्दस्यानुचराभवन् ||
१०९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
मार्कण्डेय़ उवाच
व्याधः स कथय़ामास व्राह्मणाय़ महात्मने ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रय़ोनाविति द्विज ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
व्याधाभ्यजानन्राजेन्द्र सलिलस्थं सुय़ोधनम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
व्याधितस्य विवित्साभिस्त्रस्यतो जीवितैषिणः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
व्याधितस्यौषधग्रामः क्रुद्धस्य च प्रसादनम् ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
व्याधितानां च सर्वेषामाय़ुषः प्रतिनन्दनम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
व्याधितानां च सर्वेषामाय़ुष्यमभिनन्दनम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
व्याधितो वा कृशो वापि तस्मिन्नाभून्नरः क्वचित् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
व्याधिना चाभिपन्नस्य मानसेनेतरेण वा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
व्याधिप्रतिक्रिय़त्वाच्च विद्यते रसनं द्रुमे ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
व्याधिप्रशमनार्थं च तेषां पूजां समाचरेत् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
व्याधिभिः परिकृष्यन्ते मृगा व्याधैरिवार्दिताः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
व्याधिभिर्भक्ष्यमाणानां त्यजतां विपुलं धनम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
व्याधिभिश्च विमथ्यन्ते व्यालैः क्षुद्रमृगा इव ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
व्याधिमृत्युमहाग्राहं महाभय़महोरगम् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
व्याधिरग्निर्जलं शस्त्रं वुभुक्षा श्वापदं विषम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
व्याधिराप्याय़ित इव तस्य मूलं छिनत्ति सः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
व्याधिव्रणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
प्रजा ऊचुः
व्याधीन्प्रणुद्य वीर त्वं प्रजा धर्मेण पालय़ |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
व्याधय़श्च भवन्त्यत्र म्रिय़न्ते चागताय़ुषः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
व्याधय़ो न भवन्त्यत्र नाल्पाय़ुर्दृश्यते नरः |
११ क