अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
अन्विष्यतां वै ज्वलनस्तथा चाद्य निय़ुज्यताम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
अन्विष्यतां स तु क्षिप्रं तेजोराशिर्हुताशनः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
अन्विष्यमाणं तदपि दैवमेवावतिष्ठते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
अन्वीक्ष्यमाणः कविभिः पुनर्गच्छत्यदर्शनम् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
अन्वीय़ च पुनः सर्वांस्तव पुत्रानपीडय़त् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
११
व्यास उवाच
अन्वीय़ पाण्डवान्भ्रातॄनिहैवास्मद्दिदृक्षय़ा ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अन्वीय़मानः सहितैः सोदरैः सर्वतो नृपः ||
२६ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
अन्वीय़मानो रुद्रेण युधिष्ठिर नभस्तले ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वीय़मानो वीरेण दाशार्हेण महात्मना |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
अन्वेके प्रजिहीर्षन्ति ये पुरस्ताद्विमानिताः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अन्वेतारः कङ्कपत्राः शिताग्रा; स्तदा तप्स्यस्यर्जुनस्याभिय़ोगात् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
अन्वेनां वाय़वो वान्ति तथैवेन्द्रधनूंषि च |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
अन्वेव च ततो व्योम्नः पुष्पवर्षमवापतत् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
अन्वेव चैन्द्रं विजय़ं व्यजिगीषन्त पार्थिवाः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
अन्वेव वाय़वो वान्ति तथाभ्राणि वय़ांसि च |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वेषणे पाण्डवानां भूय़ः किं करवामहे |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
अन्वेषति स्म भर्तारं वने श्वापदसेविते ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वेषन्त तदा नष्टं ज्वलनं भृशदुःखिताः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
अन्वेषन्तो नलं राजन्नाधिजग्मुर्द्विजातय़ः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
अन्वेषमाणश्च न तत्र पुत्रं; ददर्श चुक्रोध ततो भृशं सः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अन्वेषमाणां भर्तारं तं वै नरवरोत्तमम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वेषमाणाः सव्रीडाः स्वप्नवद्गतमानसाः ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
अन्वेषमाणास्तुरगं नीता वैवस्वतक्षय़म् ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
अन्वेष्टव्याः सुपुरुषाः सहाय़ा राज्यधारणाः |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वेष्टव्याश्च निपुणं पाण्डवाश्छन्नवासिनः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
कुन्त्यु उवाच
अन्वेष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ं सम्प्रवक्ष्यामि पक्षैश्च कुलतो गणान् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ाः कुशिका राजञ्जह्नोरमिततेजसः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ातां ततो मध्ये वासुदेवधनञ्जय़ौ ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अन्वय़ातां महात्मानौ विशन्तं तावकं वलम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ात्पृष्ठतो राजन्युय़ुत्सुः पाण्डवाग्रजम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्वय़ाद्भ्रातरं रामं विनिवर्तनलालसः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अन्वय़ाद्भ्रातरं सङ्ख्ये पाण्डवं सव्यसाचिनम् ||
८५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ुः कुरुराजानं धृतराष्ट्रदिदृक्षय़ा ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ुः पाण्डवास्तां तु सभृत्यान्तःपुरास्तदा |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ुः पृष्ठतो राजन्यावदध्यावसत्कुरून् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ुर्वृष्णिशार्दूलं वासुदेवं महाद्युतिम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ुर्व्राह्मणा राजन्साग्नय़ोऽनग्नय़स्तथा ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अन्वय़ुस्तद्रथानीकं क्षरन्त इव तोय़दाः ||
२२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अन्वय़ुस्त्वरितास्ते वै राजानं श्रान्तवाहनाः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
अनय़ं द्यूतरूपेण महापाय़मुपस्थितम् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
अनय़त्प्रेतराजस्य भवनं साय़कैः शितैः ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
अनय़द्यः पुरा सङ्ख्ये सोऽनय़ान्निधनं गतः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
अनय़न्परलोकाय़ शरैः संनतपर्वभिः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अनय़न्मृत्युलोकाय़ चतुर्भिः साय़कोत्तमैः ||
७४ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अनय़स्य फलं तस्य व्रूहि गावल्गणे पुनः ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
अनय़स्यास्य तु मुखं भीष्मः शान्तनवो मम ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अनय़ा किं मय़ा कार्यं तन्मे तत्त्वेन शंसत ||
१०७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अनय़ा चैव भक्त्या ते अत्यर्थं प्रीतिमानहम् |
१७६ क