शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ प्रतिभय़ं रूपं तदा रुद्रस्य भारत ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
वभौ प्रतीतः सुमनाः परिपूर्णेन्दुदर्शनः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
वभौ भीमो निशापाय़े धीमान्सूर्य इवोदितः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
वभौ भीष्मस्तदा राजंश्चन्द्रमा इव मेरुणा ||
४८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ भूमिः प्रतिभय़ा तदा रुधिरकर्दमा ||
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
वभौ महामन्त्रहुतार्चिमाली; सदोगतः सन्भगवानिवाग्निः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ महोल्केव घनान्तरस्था; शिखेव चाग्नेर्ज्वलिता विधूमा ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
वभौ मेघेन धाराभिर्गिरिर्मेरुरिवार्दितः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ यथा दानवसङ्क्षय़े पुरा; पुरन्दरो देवगणैः समावृतः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ यथा भूतपतिर्महात्मा; समेत्य साक्षाद्भगवान्गुहेन ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ युधिष्ठिरस्तत्र पौर्णमास्यामिवोडुराट् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
वभौ रणे दीप्तमरीचिमण्डलो; यथांशुमाली परिवेषवांस्तथा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
वभौ रथवरः कॢप्तः शिशुर्दिवसकृद्यथा ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
वभौ रश्मीनिवादित्यो भुवनेषु समुत्सृजन् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
वभौ रामस्तदा राजन्क्वचित्किंशुकसंनिभः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
वभौ रामस्तदा राजन्मेरुर्धातूनिवोत्सृजन् ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ रुक्ममय़ैः काशैः सर्वतः पुरुषर्षभ ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
वभौ रूपं महाघोरं कालस्येव युगक्षय़े ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ वर्षाम्वुभिः क्लिन्नं पद्ममागलितं यथा ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
वभौ वलं तद्विमुक्तं पदवन्धाद्विशां पते |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ वलमनाधृष्यं कर्णिकारवनं यथा ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
वभौ वासन्तिक इव पलाशः पुष्पितो महान् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
वभौ सविद्युत्स्तनय़ित्नुकल्पा; जलागमे द्यौरिव जातमेघा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
वभ्रमुः क्षुधिता मर्त्याः खादन्तः स्म परस्परम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
वभ्रमुः शतशो नागा मृद्नन्तः शतशो नरान् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
वभ्रमुश्चस्खलुः पेतुर्नेदुर्मम्लुश्च मारिष ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
वभ्रमुस्तत्र तत्रैव गावः शीतार्दिता इव ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
युधिष्ठिर उवाच
वभ्रवे विश्वमाय़ाय़ महाभाग्यं च तत्त्वतः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
वभ्राजिरे महात्मानः कुरुमध्ये यथाग्नय़ः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
वभ्राजे स रथोऽत्यर्थमुह्यमानो रणे तदा |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
वभ्राम तत्र तत्रैव गावः शीतार्दिता इव ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
वभ्राम तत्र तत्रैव देवसैन्यमचेतनम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
वभ्राम तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
वभ्राम तस्मिन्विजने नानामृगसमाकुले ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
वभ्राम पार्षतं सैन्यं तत्र तत्रैव भारत ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
वभ्रुकौशेय़वर्णास्तु सुवर्णवरमालिनः |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
वभ्रुवाहनमालिङ्ग्य समाजिघ्रत मूर्धनि ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
वभ्रूग्रसेनय़ो राज्यं नाप्तुं शक्यं कथञ्चन |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
वभ्रूणि चैव श्मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलय़त् ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
वमन्तं रुधिरं वक्त्रादपश्यन्वसुधातले ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
वमन्तं विपुलां ज्वालां ददृशातेऽग्निवर्चसम् ||
६९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वमन्ति रुधिरं चास्यैः स्विद्यन्ति प्रपतन्ति च ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वमन्तो रुधिरं गात्रैर्विमस्तिष्केक्षणा युधि ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
वमन्तो रुधिरं चान्ये भिन्नकुम्भा महागजाः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
नारद उवाच
वर एष ममात्यन्तं दृष्टस्त्वं यत्सनातनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
वर एष वृतो देव तद्विद्धि सुरसत्तम ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
वरं कूपशताद्वापी वरं वापीशतात्क्रतुः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
वरं क्रतुं समाजह्रे वरुणः परवीरहा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
वरं क्रतुशतात्पुत्रः सत्यं पुत्रशताद्वरम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
वरं गृहाण राजर्षे यस्ते मनसि वर्तते |
३३ क