chevron_left  arrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
स हीनः करणैः सर्वैरुच्छ्वासपरमो नृपः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
स हीशो भगवान्देवः सर्वभूतात्मभावनः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
स हेममाली तपनीय़भाण्डा; त्पपात नागाद्गिरिसंनिकाशात् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
स हैहय़सहस्राणि हत्वा परममन्युमान् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
स हैहय़ान्समुत्साद्य तालजङ्घांश्च भारत |
७ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
स ह्यक्षहृदय़ज्ञस्तान्क्रीडय़ामास पाण्डवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
धृतराष्ट्र उवाच
स ह्यस्पर्धत पार्थेन नित्यमेव महारथः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
स ह्याददानो धनुरुग्रवेगं; भूरिश्रवा भारत सौमदत्तिः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
स ह्येवैकः पृथिवीं सव्यसाची; गाण्डीवधन्वा प्रणुदेद्रथस्थः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
स ह्येषां वृत्तिदाता स्यात्स चैतान्परिपालय़ेत् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
स हय़ं पाण्डुपुत्रस्य विषय़ान्तमुपागतम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
स हय़ः पृथिवीं राजन्प्रदक्षिणमरिन्दम |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
स हय़ान्संनिगृह्याजौ स्वय़ं हय़विशारदः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
सं वर्धय़न्स्तोकमिवाग्निमात्मवा; न्स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
संनतः प्रश्रितो भूत्वा वाक्यमर्जुनमव्रवीत् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
संनतिः श्रीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्च निय़ताच्युते ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
संनद्धः कवची खड्गी वद्धगोधाङ्गुलित्रवान् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
संनद्धः कवची खड्गी वद्धगोधाङ्गुलित्रवान् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
संनद्धः स गदी राजन्सज्जः सङ्ग्राममूर्धनि |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
संनद्धश्चार्जुनो योद्धा तेषां नास्ति पराजय़ः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
संनद्धा युद्धकुशला रौद्ररूपा महावलाः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
संनद्धाः प्रत्यदृश्यन्त ग्रहाः प्रज्वलिता इव ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
संनद्धाः समदृश्यन्त प्रतपन्त इवाग्नय़ः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
संनद्धाः समदृश्यन्त भूय़ो युद्धचिकीर्षय़ा ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
संनद्धाः समदृश्यन्त राजानश्च महावलाः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
संनद्धाः समदृश्यन्त स्वेष्वनीकेष्ववस्थिताः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
संनद्धान्येव ददृशुर्मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
संनद्धास्तेषु ते वीरा ददृशुर्युद्धकाङ्क्षिणः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
संनद्धो दीक्षितः सर्वो योधः प्राप्य चमूमुखम् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
संनद्धो ह्यर्जुनो याति विवृत्य परमेषुधी |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
संनह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
संनह्यतां तनुत्राणि रथान्योजय़तामपि ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
संनह्यतां पदातीनां वाजिनां च विशां पते ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
संनह्यतां पदातीनां हय़ानां चैव भारत |
३ क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
संनह्यध्वं सर्व एवेन्द्रकल्पा; महान्ति चारूणि च दंशनानि |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
संनादिता येन लोकाः सर्वाश्चैव दिशो दश ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
संनादय़न्तस्ते विश्वमश्वत्थामानमभ्ययुः ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
संनादय़न्तो वसुधां दिशश्च; क्रुद्धा नृसिंहा जय़मभ्युदीय़ुः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
संनादय़न्तो वसुधामभिदुद्रुवुरार्जुनिम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
संनिकृष्टफलास्ता हि लघ्वर्थाश्च युधिष्ठिर |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
संनिकृष्टश्च देवस्य न चान्यैर्मानुषैर्वृतः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
संनिकृष्टां कथां प्राज्ञो यदि वुद्ध्या वृहस्पतिः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
संनिकृष्टांश्चरेदेनान्न चैनान्मनसा त्यजेत् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
संनिधौ ते महाराज क्रोधजं पापवुद्धिजम् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
संनिधौ धृतराष्ट्रस्य प्रोच्यमानं मय़ा श्रुतम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
संनिधौ लोकपालानां सर्वेषामेव भारत ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
संनिधौ विदुरस्य त्वां वक्तुं नृप न शक्नुवः |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
संनिपत्य तु शाखाय़ां न्यग्रोधस्य विहङ्गमः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
संनिपत्य स्वविषय़े भय़ं राष्ट्रे प्रदर्शय़ेत् ||
२४ ख