द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्यूहस्योपरि ते राजन्स्थिता युद्धविशारदाः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
व्यूहानपि महारम्भान्दैवगान्धर्वमानुषान् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
व्यूहाश्च विविधाभिख्या विचित्रं युद्धकौशलम् ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
व्यूहाय़ विदधू राजन्पाण्डवान्प्रति दंशिताः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
व्यूहिष्यामि च तं व्यूहं यं पार्थो न तरिष्यति ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्यूहेन मण्डलार्धेन प्रत्यव्यूहद्युधिष्ठिरः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
व्यूहेष्वालोड्यमानेषु पाण्डवानां ततस्ततः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
व्यूहोऽनय़ः प्रमादश्च परितापः परिग्रहः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
व्यूहौ च व्यूह्य संरव्धाः सम्प्रय़ुद्धाः प्रहारिणः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यूह्य चौशनसं व्यूहं हरीन्सर्वानहारय़त् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्यूह्य तानि वलान्याशु प्रय़यौ फल्गुनस्तदा ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
व्यूह्य पार्थः स्वकं सैन्यमतिष्ठद्भ्रातृभिः सह ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
व्यूह्य व्यूहं महाराज सर्वतोभद्रमृद्धिमत् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
व्यूह्यानीकं रथैरेव चन्द्रार्धाख्यं मुदान्विताः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
व्यूहय़न्त्राय़ुधीय़ानां तत्त्वज्ञो विक्रमान्वितः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
व्यृद्धं राष्ट्रं भवति क्षत्रिय़स्य; व्रह्म क्षत्रं यत्र विरुध्यते ह |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
व्येतु ते मानसं दुःखं क्षत्रिय़ाः स्मो नरर्षभ |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
व्येतु ते शक्र सन्तापस्त्वमेवेन्द्रो भविष्यसि ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
व्येतु वो भीरहं कृष्णौ प्रेषय़िष्यामि मृत्यवे ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
व्येतु सन्तापजं दुःखं तव भास्कर मानसम् |
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
व्योम सन्दीपय़ाना सा ससृजे पावकं वहु ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
व्योम्नि तस्य परं स्थानमनन्तमथ लक्ष्यते ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
व्रज तीर्थानि निय़तः पुण्यं पुण्येन वर्धते ||
९० ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रजतस्तान्विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
व्रजत्यदर्शनं लोकः पुनरप्सु निमज्जति ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
भीम उवाच
व्रजत्येव हि कल्याणी श्वेतवाहदिदृक्षय़ा ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रजन्तं लोकममलमपश्यद्देवपूजितम् ||
३० ग
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रजन्तमन्वपश्यत्स जैगीषव्यं महामुनिम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
व्रजन्ति ते परां गतिं गृहस्थधर्मसेतुभिः ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
व्रजन्तु शेषाः स्वपुराणि पार्थिवा; निवृत्तवैराश्च भवन्तु सैनिकाः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रजन्नेव तु वीभत्सुः सखाय़ं पुरुषर्षभम् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
व्रणद्वाराण्यधिष्ठाय़ कर्माण्यात्मनि मन्यते ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
इन्द्र उवाच
व्रणश्चापि न गात्रेषु यस्त्वं नानृतमिच्छसि ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
व्रतं चक्रे विनाशाय़ जिह्मगानां धृतव्रतः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रतं चचार धर्मात्मा कृष्णो द्वादशवार्षिकम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
व्रतं चरति या नित्यं दुश्चरं लघुसत्त्वय़ा |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
व्यास उवाच
व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मय़ा ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
व्रतं चर्तुमिहाय़ातस्त्वहं गिरिमिमं शुभम् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
व्रतं तस्यैतत्सर्वदा शक्रसूनो; कच्चित्त्वय़ा निहतः सोऽद्य कर्णः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रतं त्रिरात्रमुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताभवत् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
द्युमत्सेन उवाच
व्रतं भिन्धीति वक्तुं त्वां नास्मि शक्तः कथञ्चन |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
व्रतं यज्ञान्निय़मान्ध्यानय़ोगा; न्कामेन यो नारभते विदित्वा |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
व्रतं वै मम लोकोऽय़ं वेत्ति कृत्स्नो विभावसो |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रतचर्या तपो वापि स्नानमन्त्रौषधानि वा |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
व्रतचर्यापरीतस्य तपस्विव्रतसेवय़ा |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
व्रतचर्यापरो धर्मो गुरुपादप्रसादनम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
व्रतचर्यास्तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन्काले प्रवर्तते ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
व्रतमेतन्मम सदा पृथिव्यामपि विश्रुतम् |
६२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
व्रतवन्तं तपोनित्यमनन्तं तपतां गतिम् ||
७ ख