वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मघोषपुरस्कारः सञ्जल्पः समजाय़त ||
४२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मघोषाश्च भूय़ांसः पूर्णाहुत्यस्तथैव च |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मघोषैर्दिवं तिष्ठन्त्यमरा व्रह्मय़ोनय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
व्रह्मघोषैर्विरहितः पर्वतोऽय़ं न शोभते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
व्रह्मघ्नानां गतिं ज्ञात्वा पतितानां सुदारुणाम् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मघ्नानां च ये लोका ये च गोघातिनामपि ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
व्रह्मघ्ने गुरुतल्पे च भ्रूणहत्ये तथैव च ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
व्रह्मघ्ने च सुरापे च चोरे भग्नव्रते तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
व्रह्मघ्ने च सुरापे च चोरे भग्नव्रते तथा |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
व्रह्मचर्यं चरत्येष शिवा यास्य तनुस्तथा ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
व्रह्मचर्यं चरत्येष शिवा यास्य तनुस्तय़ा |
९७ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय़्यहं परमं गुरौ |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचर्यं तथा सत्यमनुक्रोशो धृतिः क्षमा |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
व्रह्मचर्यं तपो मन्त्राः सत्यं च व्राह्मणे सदा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
व्रह्मचर्यं तपो मन्त्राः सत्यं चापि द्विजातिषु ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
व्रह्मचर्यं दहेद्राजन्सर्वपापान्युपासितम् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
व्रह्मचर्यं परं तात मधुमांसस्य वर्जनम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
व्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि निय़तस्त्वय़ि |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचर्यं महद्घोरं चीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
व्रह्मचर्यं वेदविद्याः क्रिय़ाश्च; निषेवमाणा मुनय़ोऽमुत्र भान्ति ||
१४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
व्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
अर्जुन उवाच
व्रह्मचर्यमिदं भद्रे मम द्वादशवार्षिकम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचर्यरतो नित्यं सदा धर्मपराय़णः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचर्यव्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मचर्यश्रुतिमुखैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
व्रह्मचर्यस्य तु गुणाञ्शृणु मे वसुधाधिप |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
व्रह्मचर्याश्रमं प्राहुश्चतुर्थं व्राह्मणैर्वृतम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
व्रह्मचर्येण कृत्स्नो मे वेदः श्रुतिपथं गतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
व्रह्मचर्येण घोरेण आचार्यकुलसेवय़ा |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
व्रह्मचर्येण यज्ञेन दानेन तपसा तथा |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मचर्येण यां यान्ति मुनय़ः संशितव्रता |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
व्यास उवाच
व्रह्मचर्येण वै लोकाञ्जय़न्ति परमर्षय़ः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मचर्येण शुद्धेन दमेन निय़मेन च |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
व्रह्मचर्योपपन्नश्च त्वद्विधो नैव मुह्यति ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
व्रह्मचारिकमेवाहुराश्रमं प्रथमं पदम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
व्रह्मचारी च नित्यं स्यात्पादं पादेन नाक्रमेत् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
व्रह्मचारी च वेदान्यो अधीय़ीत द्विजोत्तमः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
व्रह्मचारी चरेद्भैक्षं स्वकर्मोदाहरन्मुनिः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
व्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यसन्धस्त्वहिंसकः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
व्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रान्मुच्यते भवात् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मचारी यतात्मा च सततं विपुलव्रतः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
व्रह्मचारी यताहारस्तपस्युग्रे रतः सदा ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचारी रतिगुणः सुपर्णश्चैव सप्तमः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
व्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी सुचारवित् |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचारी वहुगुणः सुपर्णश्चेति विश्रुतः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो वहुलाः समाः |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचारी व्रती चापि दुरवापमवाप्य तत् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
व्रह्मचारी व्रती नित्यं नित्यं दीक्षापरो वशी |
१९ क