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शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
देवेभ्यो व्राह्मणा लोके जाग्रतीत्युपधारय़ |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
देवेशश्च यथा नॄणां गङ्गेह सरितां तथा ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
देवेषु कीर्तिं लभते यशसा च विराजते ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
देवेषु चैव व्यग्रेषु तस्मिन्यज्ञविधौ तदा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
देवेषु देवप्रामाण्यं नैव तद्विक्रमिष्यति ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
देवेष्वाहूय़मानेषु स्थितेषु परमर्षिषु ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
देवैः पूर्वगतं मार्गमनुय़ातोऽसि भारत ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
वृहस्पतिरु उवाच
देवैः सह त्वमसुरान्सम्प्रणुद्य; जिघांससेऽद्याप्युत सानुवन्धान् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
देवैः सेन्द्रैर्मुनिभिर्मानवैश्च; निषेविता सर्वकामैर्युनक्ति ||
८२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
देवैः सेन्द्रैश्च को गङ्गां नोपसेवेत मानवः ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मय़ा |
११० क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मय़ा |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
देवैरपि युधा जेतुं शक्याः किमुत पाण्डवैः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
देवैरपि विसृष्टानि शस्त्राण्यस्य महीपते |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
देवैरपि सुदुर्धर्षमस्त्रमाग्नेय़माददे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
शल्य उवाच
देवैरपि हि दुःखानि प्राप्तानि जगतीपते ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
देवैरपि हि संय़त्तैर्विभ्रद्भिर्मांसशोणितम् |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
देवैरपिहितद्वाराः सोपमा पश्यतो मम ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
देवैरप्यापदः प्राप्ताश्छन्नैश्च वहुशस्तथा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १५
सूत उवाच
देवैरसुरसङ्घैश्च मथ्यतां कलशोदधिः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
देवैरिव महाभागैः समवेतैस्त्रिविष्टपम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
देवैरिव यथा स्कन्दः सङ्ग्रामे तारकामय़े ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
देवैर्न शक्यते हन्तुं स कथं प्रशमं व्रजेत् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
इन्द्र उवाच
देवैर्न संमितावेतौ तस्मान्मैवं वदस्व नः ||
१७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
देवैर्भ्राजिष्णुभिः साध्यैः सहितं पुण्यकर्मभिः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
देवैर्मनुजशार्दूल द्विषतामभिमर्दने ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
देवैर्मनुष्यैर्गन्धर्वैरसुरैरुरगैश्च यः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
देवैर्महर्षिभिश्चैव साधु साध्विति भारत |
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२
अर्जुन उवाच
देवैर्वा सहितो दैत्यैर्न त्वां प्राप्स्यत्यसौ मृधे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
देवैर्हि सम्भृतो दिव्यो रथो गाण्डीवधन्वनः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
देवैश्च सुमहाभागैर्महादेवो व्यतिष्ठत ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
देवो नदनदीभर्ता श्रीमान्यादोगणैर्वृतः ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
देवो नाराय़णस्तस्यां तथा देवर्षय़श्च ये |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
देवो मनुष्यो गन्धर्वो युवा चापि स्वलङ्कृतः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
देवो यः संश्रितस्तस्मिन्नव्विन्दुरिव पुष्करे |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नव्विन्दुरिव पुष्करे |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
अर्जुन उवाच
देवो वा मानुषो वापि तस्माज्ज्येष्ठो द्विजादहम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
देवो वा यदि वा दैत्य उरगो वा भवान्यदि |
४ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थितः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
देवोद्यानेषु सर्वेषु नन्दनोपवनेषु च |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
इन्द्र उवाच
देवोपभोग्यं दिव्यं च आकाशे स्फाटिकं महत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
देवोऽस्माभिर्न दृष्टः स कथं त्वं द्रष्टुमर्हसि |
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय १०६
वैशम्पाय़न उवाच
देवोऽय़मित्यमन्यन्त चरन्तं वनवासिनः ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुषः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
देव्या दिव्येन विधिना वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
देव्या विवाहे निर्वृत्ते रुद्राण्या भृगुनन्दन |
४१ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
देव्या सहोमय़ा श्रीमान्समानव्रतवेषय़ा |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
देव्याः पुत्रो भवेद्राजंस्तप्तकुण्डलविग्रहः |
१०१ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
देव्याः सोऽथ वचः श्रुत्वा स तस्या नृपसत्तमः |
२३ ख