chevron_left  व्रह्मदेय़ानुसन्तानश्छन्दोगोarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
व्रह्मदेय़ानुसन्तानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मद्रव्ये गुरुद्रव्ये ज्ञातिद्रव्येऽप्यहिंसकाः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
व्रह्मद्विट्चापि पतति व्राह्मणो व्रह्मय़ोनितः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
व्रह्मद्विड्भविता तं वै हनिष्यामीति भार्गव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
व्रह्मद्विषघ्ने सततं कृतज्ञे; सनातनं चन्द्रमसीव लक्ष्म |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
व्रह्मद्विषो निय़च्छन्तस्तेषां नोऽस्तु सलोकता |
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
व्रह्मन्न कामकारोऽस्ति स्त्रीणां पुरुषतो धृतिः |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
प्रह्राद उवाच
व्रह्मन्नभ्यर्चनीय़ोऽसि श्वेता गौः पीवरीकृता ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
व्रह्मन्पितेव पुत्रेभ्यः प्रति मां वाञ्छ शौनक ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
व्रह्मन्भरतशार्दूलो राजा पारिक्षितस्तदा ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय १२८
सोमक उवाच
व्रह्मन्यद्यद्यथा कार्यं तत्तत्कुरु तथा तथा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
व्रह्मन्वराहरूपेण मनोमारुतरंहसा ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
जनमेजय़ उवाच
व्रह्मन्व्रह्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
अग्निरु उवाच
व्रह्मन्स तेनाचरते व्रह्महत्यां; लोकास्तस्य ह्यन्तवन्तो भवन्ति ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८८
धृष्टद्युम्न उवाच
व्रह्मन्समभिवर्तेत सद्वृत्तः संस्तपोधन ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
व्रह्मन्साध्विदमुक्तं ते हितं सर्वदिवौकसाम् |
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
व्रह्मन्सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
व्रह्मप्रोक्तमिदं धर्ममृषिप्रवरसेवितम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
व्रह्मप्रोक्तैरृषिप्रोक्तैर्वेदवेदाङ्गसम्भवैः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
व्रह्मभावप्रसूतानां वैद्यानां भावितात्मनाम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
व्रह्मभूतं कुलं मेऽस्तु धर्मे चास्य मनो भवेत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
व्रह्मभूतः स निर्द्वन्द्वः सुखी शान्तो निरामय़ः ||
१२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
व्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
व्राह्मण उवाच
व्रह्मभूतश्चरँल्लोके व्रह्मचारी भवत्ययम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
व्रह्मभूतश्चरन्विप्रः कृष्णद्वैपाय़नः पुरा |
७ क
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
व्रह्मभूतस्य संय़ोगो नाशुभेनोपपद्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
व्रह्मभूतस्य संय़ोगो नाशुभेनोपपद्यते |
५२ क
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मभूता नराः पुण्याः पुराणाः कुरुनन्दन ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
व्रह्मभूता विरजसस्ततो यान्ति परां गतिम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मभूतैर्महाभागैरुपेतं व्रह्मवादिभिः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३
सहदेव उवाच
व्रह्ममृत्यू च तौ राजन्नात्मन्येव समाश्रितौ |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
व्रह्मरक्षस्तु त्रीन्मासांस्ततो जाय़ति व्राह्मणः ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
व्रह्मराजर्षय़ः सर्वे सर्वे देवर्षय़स्तथा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
व्रह्मराशिं समावृत्य लोहिताङ्गो व्यवस्थितः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मरूपधरा भूत्वा मात्रा सह परन्तपाः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मरूपधराञ्श्रुत्वा पाण्डुराजसुतांस्तदा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रिय़म् ||
३२ ग
आदि पर्व
अध्याय १६४
गन्धर्व उवाच
व्रह्मर्षिः पाण्डवश्रेष्ठ वृहस्पतिरिवामरान् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
व्रह्मर्षिणा च तपता वर्षाणां शतमत्रिणा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
व्रह्मर्षिदेवगन्धर्वय़क्षराक्षसकिंनराः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
व्रह्मर्षिदेवदैत्यानां पुराणानां महात्मनाम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
व्रह्मर्षिदेवर्षिनृपर्षिमध्ये; यत्तन्निवोधेह ममाद्य राजन् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
व्रह्मर्षिभिश्च देवैश्च यः पुरा कथितो भुवि ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मर्षिराजर्षिसुपर्णजुष्टं; वभौ विय़द्विस्मय़नीय़रूपम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मर्षिसदृशः पाण्डुर्वभूव भरतर्षभ ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
व्रह्मर्षिसदृशो जज्ञे देवैरपि दुरुत्सहः |
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
व्रह्मर्षिस्तामथोवाच स तथेति युधिष्ठिर |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
व्रह्मर्षींश्चापि देवांश्च गोपाय़स्व त्रिविष्टपे ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
व्रह्मर्षीणां सहस्रं हि उवाह शिविकां मम |
३६ क