chevron_left  वक्त्रेणोत्पलनालेनarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
वक्त्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
वक्त्रैर्नानाविधैर्ये तु शृणु ताञ्जनमेजय़ ||
७३ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
वक्रः करूषाधिपतिर्माय़ाय़ोधी महावलः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
वक्रवाह्वङ्गुलीसक्ताः कृशा धमनिसन्तताः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
वक्राङ्गभारहस्तं तं धनुष्पाणिं कृतागसम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
वक्राङ्गांस्तु स नित्यं वै सर्वतो वाणगोचरे |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
वक्रानुवक्रं कृत्वा च श्रवणे पावकप्रभः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
वक्रानुवक्रगमनादङ्गारक इव ग्रहः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
वक्रानुवक्रौ वलिनौ मेषवक्त्रौ वलोत्कटौ |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
वक्षः पश्य विशालं च सर्वशत्रुनिवर्हणम् ||
१६१ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
वक्षस्यानीय़ वेगेन ममन्थैनं विचेतसम् ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
वक्षोदेशे समासाद्य ताडय़ामास संय़ुगे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
शौनक उवाच
वक्ष्यन्ति मामधर्मज्ञा वक्ष्यन्त्यसुहृदो जनाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
वक्ष्यामि जाजले वृत्तिं नास्मि व्राह्मण नास्तिकः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
वक्ष्यामि तदशेषेण रोहिण्यो निर्मिता यथा ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
वक्ष्यामि तदहं वीर तज्जुषस्व नराधिप ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
वक्ष्यामि तु त्वां सन्तप्तो निहीन कुलपांसन ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
वक्ष्यामि तु यथामात्यान्यादृशांश्च करिष्यसि ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
वक्ष्यामि त्वा कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
वक्ष्यामि निय़तं मातस्तन्मे निगदतः शृणु ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
इन्द्राण्यु उवाच
वक्ष्यामि यदि मे राजन्प्रिय़मेतत्करिष्यसि |
१० ख
वन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
वक्ष्यामि हृत्स्थं सन्देहं तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
वक्ष्ये यदुकुलश्रेष्ठ शृणुष्वावहितो मम ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
वङ्गपुण्ड्रकिरातेषु राजा वलसमन्वितः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
वङ्गाः कलिङ्गपतय़स्ताम्रलिप्ताः सपुण्ड्रकाः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ४१
शिशुपाल उवाच
वङ्गाङ्गविषय़ाध्यक्षं सहस्राक्षसमं वले |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
वचः श्रेय़स्करं धर्म्यं व्रुवतस्तन्निवोध मे ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
वचनं तत्त्वय़ा राजन्निखिलेनावधारितम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
देवय़ान्यु उवाच
वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
वचनं नरशार्दूल वज्राय़ुधमपि स्वय़म् ||
३२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
वचनं पुण्डरीकाक्ष न च मद्वाक्यमन्यथा ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
वचनं मम धर्मज्ञ ज्येष्ठो भ्राता भवामि ते ||
४१ ग
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
वचनं मे महाप्राज्ञ व्रुवतो यद्धितं तव ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
वचनं वाक्यतत्त्वज्ञो जीवितार्थी महामतिः ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
वचनं श्राविता रूक्षं मानुषाः संनिवर्तत ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७९
सात्यकिरु उवाच
वचनं सर्वय़ोधानां तन्मतं पुरुषोत्तम ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
वचनात्कुरुसिंहानां मत्स्यपाञ्चालय़ोश्च ते |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
वचनात्तव राजेन्द्र द्रौपद्याः सम्प्रय़च्छतु ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
वचनात्पुरुहूतस्य पार्थस्य च महात्मनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
वचनादथ कृष्णस्तु प्रय़यौ सव्यसाचिनः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
वचनादर्जुनस्यैव आचक्षध्वं जय़ं मम ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २३५
चित्रसेन उवाच
वचनाद्देवराजस्य ततोऽस्मीहागतो द्रुतम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
वचनाद्धृतराष्ट्रस्य स्नेहय़ुक्तं पुनः पुनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
वचनैर्मधुरैः स्निग्धैरसकृत्सुमनोहरैः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
वचश्चेदेतन्न करिष्यसे मे; प्राहैतदेतावदचिन्त्यकर्मा ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
वचस्तवानतिक्रामन्विन्ध्यः शैलो न वर्धते ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
व्राह्मण उवाच
वचस्ते कर्तुमिच्छामि यथाशास्त्रं महीपते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
वचोभिरव्रवीत्सत्यं त्वय़ा दुष्कृतकं कृतम् ||
८ ग
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
वज्रं क्षत्रस्य वाजिनो अवध्या वाजिनः स्मृताः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
वज्रं गृहीत्वा च पुरन्दर त्वं; सम्प्राहार्षीश्च्यवनस्यातिघोरम् |
३२ क