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अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
वरं ग्रामशतं चाहमेकैकस्य त्रिधाददम् |
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
वरं च प्रददौ तस्मै अथर्वाङ्गिरसे तदा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
वरं चास्मै ददौ देवः स च जग्राह तच्छृणु ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
वरं दत्त्वा मम प्रीतः पश्चाद्विकृतवानसि |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
वरं ददानि कृष्णाय़ै काङ्क्षितं यद्यदिच्छति ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
राजो उवाच
वरं ददानि ते हन्त तद्गृहाण यदिच्छसि |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
मतङ्ग उवाच
वरं ददानि ते हन्त वृणीष्व त्वं यदिच्छसि |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
वरं ददामि ते राजन्राज्यस्यार्धमवाप्नुहि ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
वरं ददासि चेन्मह्यं वृणोमि जनमेजय़ |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
वरं पिनाकी भगवान्सर्वभूतहिते रतः ||
११० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
वरं प्रय़च्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया |
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
वरं वरममित्राणामारुजन्तमभीतवत् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
वरं वरय़ भद्रं ते वरदोऽस्मीति भामिनि ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
वरं वृणीष्व कल्याणि यत्तेऽभिलषितं हृदि ||
४३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
वरं वृणीष्व पाञ्चालि मत्तो यदभिकाङ्क्षसि |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
वरं वृणीष्व पाञ्चालि वरार्हासि मतासि मे ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
वरं वृणीष्व पुत्र त्वं प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
वरं वृणीष्व प्रीतोऽस्मि जय़द्रथ किमिच्छसि ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महाद्युते ||
२४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रदातास्मि न संशय़ः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
वरं वृणीष्व भद्रं ते शक्रोऽहमरिसूदन ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
वरं वृणीष्व मत्तस्त्वं यत्ते मनसि वर्तते ||
९२ ख
वन पर्व
अध्याय २९८
यक्ष उवाच
वरं वृणीष्व राजेन्द्र दाता ह्यस्मि तवानघ |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
वरं वृणीष्व विप्रर्षे यदिष्टं ते सुदुर्लभम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
वरं वृणीष्वाश्वपते मद्रराज यथेप्सितम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
वरं वृणीष्वेति तदा तमुत्तङ्कोऽव्रवीदिदम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
वरं वृणीष्वेति तदा स च वव्रे वरं शुकः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा |
३० ख
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं; ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
वरं वृणे जीवतु सत्यवानय़ं; तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
वरं वृणे जीवतु सत्यवानय़ं; यथा मृता ह्येवमहं विना पतिम् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
राजपुत्र्यु उवाच
वरं वृणे भगवन्नेकमेव; विमुच्यतां किल्विषादद्य भर्ता |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
वरः कुरूणामधिपः प्रजानां; पितेव पुत्रानपहाय़ चास्मान् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
वरः संनह्यमानानामर्जुनः किं करिष्यति ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
वरः संवरणो राज्ञां त्वमृषीणां वरो मुने |
४ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
वरकनकहुताशनप्रभं; त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
वरचापधरा वीरा विचित्रकवचध्वजाः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
वरदं नमस्व कौन्तेय़ हव्यकव्यभुजं नम ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
वरदं पृथुचार्वङ्ग्या पार्वत्या सहितं प्रभुम् |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
वरदस्य वरेण्यस्य विश्वरूपस्य धीमतः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
वरदाः कामचारिण्यो नित्यप्रमुदितास्तथा ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
वरदानं ततो गच्छेत्तीर्थं भरतसत्तम |
८१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
वरदानप्रभावज्ञो नहुषस्य महात्मनः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
वरदानमहाय़ज्ञैस्तथा शक्रोत्सवेन ते ||
२६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
वरदानात्पितुः कामं छन्दमृत्युरसि प्रभो |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २१३
कन्यो उवाच
वरदानात्पितुर्भावी सुरासुरनमस्कृतः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
वरदानात्पुमाञ्जातः सैषा वै स्त्री शिखण्डिनी ||
१६ ख