शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
व्रह्मा वै सुमहातेजा य एते पञ्च धातवः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मा व्रह्मर्षिभिः सार्धं प्रजापतिभिरेव च |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मा शक्रो मारुतो व्रह्म सत्यं; वेदा यज्ञा दक्षिणा वेदवाहाः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
व्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षय़ः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
व्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षय़ः |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
व्रह्मा शिवः काश्यपश्च नद्यो देवा मनोनुगाः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
व्रह्मा सञ्चिन्तय़ामास तदा भरतसत्तम ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
व्रह्मा सनातनो देवो मम वह्वर्थचिन्तकः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
व्रह्मा समभवत्तात सर्वभूतपितामहः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
व्रह्मा सुरगुरुः स्थाणुर्मनुः कः परमेष्ठ्यथ ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
व्रह्मा सोमश्च सूर्यश्च धर्मो धाता यमोऽनलः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मा स्थाणुर्मनुर्दक्षो भृगुर्धर्मस्तपो दमः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मा स्वय़म्भूर्भगवान्सपुत्रः सह विष्णुना ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्माणं तोषय़ामासुर्घोरेण तपसा तदा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भरद्वाज उवाच
व्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान्सन्देह एव मे ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
व्रह्माणं प्रत्युवाचेदं स्निग्धगम्भीरय़ा गिरा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्माणं प्रविशस्वेति लोकसृष्ट्यर्थसिद्धय़े |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
व्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदैवतैः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
व्रह्माणं शरणं जग्मुर्वृत्राद्भीता महासुरात् ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
व्रह्माणं सोऽभ्युपागम्य मुनिः पूजां चकार ह |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
व्रह्माणमग्रतः कृत्वा वृषाङ्कं शरणं यय़ुः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
व्रह्माणमभिगम्याथ शुचिः प्रय़तमानसः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
व्रह्माणमभिसम्पूज्य जगामाशु यथागतम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
व्रह्माणमाप्नोति विभुं मूर्ध्ना देवाग्रजं तथा |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
व्रह्माणमिव देवेशमिन्द्रोपेन्द्रौ मुदा युतौ ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्माणमिव भूतानि सततं पर्युपासते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
व्रह्माणमीशं कमलासनस्थ; मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
व्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंय़तः |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
व्रह्माणमुपसङ्गम्य ततो वचनमव्रवीत् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
व्रह्माणीं च महागौरीं दुर्गामपि च भारत |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
व्रह्मादि स्तम्वपर्यन्तं भूतादि सदसच्च यत् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
व्रह्मादित्यमुन्नय़ति देवास्तस्याभितश्चराः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः |
१०१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
व्रह्मादिषु तृणान्तेषु हूतेषु परिवर्तते |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
व्रह्मादीनां खेचराणां क्षितौ च; ये चाधस्तात्संवसन्ते नरेन्द्र |
८२ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मानुशप्तमवधीन्महद्वै; कूटोन्मुक्तं मुसलं लुव्धकस्य ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मानुशिष्टो भविता सर्वत्रसवरप्रदः ||
७० ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
व्रह्माभवच्छार्ङ्गरवो अध्वर्युर्वोधपिङ्गलः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मार्पणं व्रह्महविर्व्रह्माग्नौ व्रह्मणा हुतम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मावर्तं ततो गच्छेद्व्रह्मचारी समाहितः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मावर्ते नरः स्नात्वा व्रह्मलोकमवाप्नुय़ात् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
व्रह्माव्यक्तस्य कर्मेदमिति नित्यं नराधिप ||
९७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
व्रह्माशीविषदग्धस्य नास्ति कश्चिच्चिकित्सकः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
व्रह्माश्रमपदे वृत्तं पार्श्वे हिमवतः शुभे ||
५ ग
विराट पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
व्रह्मास्त्रं चैव वेदाश्च नैतदन्यत्र दृश्यते ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मास्त्रं तु यदा राजन्कृष्णेन प्रतिसंहृतम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
व्रह्मास्त्रं दीपय़ां चक्रे तस्मिन्युधि यथाविधि ||
७ ख