शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मास्त्रं वेत्तुमिच्छामि सरहस्यनिवर्तनम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मास्त्रं व्राह्मणो विद्याद्यथावच्चरितव्रतः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
व्रह्मास्त्रं समनुप्राप्य नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
व्रह्मास्त्रमप्यवाप्यैतदुपदेशात्पितुस्तव |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
व्रह्मास्त्रमर्जुनश्चापि संमन्त्र्याथ प्रय़ोजय़त् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मास्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
व्रह्मास्त्रे तु हते राजन्भय़ं मां महदाविशत् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मास्त्रेण तदा राजा दैत्यं क्रूरपराक्रमम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
व्रह्मास्त्रेणान्तरा छित्त्वा मुमोचान्यान्पतत्रिणः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ततः सर्वमशीशमत् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र तदस्त्रं प्रत्यवारय़त् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
व्रह्मास्त्रोदीरणाच्छत्रोर्देवगन्धर्वकिंनराः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
व्रह्मास्यतो व्राह्मणाः सम्प्रसूता; वाहुभ्यां वै क्षत्रिय़ाः सम्प्रसूताः |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
व्रह्मिष्ठा व्रह्मभूताश्च व्रह्मण्येव कृतालय़ाः ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
व्रह्मेव भगवानेष सर्वभूतजगत्पतिः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मेशानावथो वाक्यमूचतुस्त्रिदशेश्वरम् |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मेशानाविवाजय़्यौ वीरावेकरथे स्थितौ |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
भीमसेन उवाच
व्रह्मेशानेन्द्रवरुणानवहद्यः पुरा रथः |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मैव तेन गन्तव्यं व्रह्मकर्मसमाधिना ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
व्रह्मैव वर्तते लोके नैति कर्तव्यतां पुनः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
व्रह्मैव विद्वांस्तेन अभ्येति सर्वं; नान्यः पन्था अय़नाय़ विद्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
व्रह्मैव संनिय़न्तृ स्यात्क्षत्रं हि व्रह्मसम्भवम् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
व्रह्मैव समिधस्तस्य व्रह्माग्निर्व्रह्मसंस्तरः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
व्रह्मैवामितदीप्तौजाः शान्तपाप्मा महातपाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मोदुम्वरमित्येव प्रकाशं भुवि भारत ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मय़ोनिं समासाद्य शुचिः प्रय़तमानसः |
१२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मय़ोनिभिराकीर्णं जगाम यदुनन्दनः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रातान्रथानामदहत्स मन्यु; र्वनं यथाग्निः कुरुपुङ्गवानाम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
व्रात्याः संश्लिष्टकर्माणः प्रकृत्यैव विगर्हिताः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
व्रात्यानां दाशमीय़ानां कृतेऽप्यशुभकर्मणाम् |
६६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
व्रात्यानां दासमीय़ानां विदेहानामय़ज्वनाम् ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
व्रात्यानां वाटधानानां भोजानां चापि मानिनाम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
व्रात्यानामत्र जाय़न्ते सैरन्ध्रा मागधेषु च |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मं दैवमासुरं च सप्रय़ोगचिकित्सितम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मं पाञ्चालाः कौरवेय़ाः स्वधर्मः; सत्यं मत्स्याः शूरसेनाश्च यज्ञः |
७३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मं रूपं ततः कृत्वा महादेवो महाय़शाः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
व्राह्मं वेदमधीय़न्तस्तोषय़न्त्यमरानपि ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मं वेदमधीय़ाना वेदाङ्गानि च सर्वशः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
व्राह्मं व्रतं नित्यमास्थाय़ विद्धि; न त्वेवाहं तस्य फलादिहागाम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
व्राह्मः क्षात्रोऽथ गान्धर्व एते धर्म्या नरर्षभ |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मः स्वभावः कल्याणि समः सर्वत्र मे मतिः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
व्राह्मण प्रतिजानीहि प्रव्रूहि यदि चेच्छसि |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
व्राह्मणं कारणं कृत्वा नाय़ं संस्थास्यते क्रतुः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
व्राह्मणं क्रोधसन्तप्तं ज्वलन्तमिव तेजसा |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
व्राह्मणं क्षत्रधर्माणं राममुत्पादय़िष्यति ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
व्राह्मणं क्षत्रिय़ं सर्पं सर्वे ह्याशीविषास्त्रय़ः ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
अम्वरीष उवाच
व्राह्मणं चापि जहतु यस्ते हरति पुष्करम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भरद्वाज उवाच
व्राह्मणं चापि जय़तां विसस्तैन्यं करोति यः ||
६१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
व्राह्मणं जनको राजा सन्नं कस्मिंश्चिदागमे |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
व्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितव्रतम् |
४ क