वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
व्राह्मणश्च विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ||
९५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणश्च विशेषेण माननीय़ो ममेति च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
व्राह्मणश्चानधीय़ानस्त्रय़स्ते नामधारकाः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
व्राह्मणश्चेन्न विद्येत श्रुतवृत्तोपसंहितः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्तु कुलं हन्याद्ध्यानेनावेक्षितेन च |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्त्रिषु कालेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
व्राह्मणस्त्वव्रवीद्वाक्यं कस्मिन्काले क्षणो भवेत् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्थपतिभ्यां च निर्मितं यन्निवेशनम् |
१११ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्य उपाहृत्य यशः पीत्वा च पाण्डवः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
व्राह्मणस्य कवेः पुत्रा वारुणास्तेऽप्युदाहृताः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
व्राह्मणस्य गवां राजन्ह्रिय़तीनां रजः पुरा |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
व्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रिय़स्य विशेषतः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य च यत्कृत्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
व्राह्मणस्य च संवादं जनकस्य च भामिनि ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य च संवादं यमस्य च युधिष्ठिर ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य तपोय़ोगात्सौहृदेनाभिचोदितः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
व्राह्मणस्य तु यत्कृत्यं तत्ते वक्ष्यामि पृच्छते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य तु यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि केवलम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
व्राह्मणस्य परो धर्मो वेदानां धरणादपि ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्य पृथा राजन्न चकाराप्रिय़ं तदा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य न मय़ा तदुपाकृतम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्य प्रमत्तस्य हविर्ध्वाङ्क्षैर्विलुप्यते |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
व्राह्मणस्य फलं हीदं क्षत्रिय़ेऽभिहितं शृणु |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
प्रह्लाद उवाच
व्राह्मणस्य महाप्राज्ञ धर्मकृच्छ्रमिदं शृणु ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्य महाराज नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा सन्तप्तोऽथ युधिष्ठिरः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्मविशेषवत् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
व्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कथञ्चन ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणस्य वशं नाहमिय़ामद्य यथा प्रभो |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य विशुद्धस्य तपस्यभिरतस्य च |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य विशेषेण तत्त्वज्ञानेन जाय़ते ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणस्य विशेषेण तवैतन्नोपपद्यते ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य विशेषेण दमो धर्मः सनातनः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
व्यास उवाच
व्राह्मणस्य सतश्चैव यस्मात्ते वृत्तमीदृशम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य सुरापस्य गन्धमाघ्राय़ सोमपः |
७१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य हि दत्तेन ध्रुवं स्वर्गो ह्यनुत्तमः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य हि देहोऽय़ं न कामार्थाय़ जाय़ते |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
व्राह्मणस्यातिथेश्चैव स्वार्थे प्राणैर्विय़ोजनम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्यानृतेऽधर्मः प्रोक्तः पातकसञ्ज्ञितः |
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्यापि चेद्राजन्क्षत्रधर्मेण तिष्ठतः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
व्राह्मणस्याभिशापेन रामस्य च महात्मनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
व्राह्मणस्येह चत्वार आश्रमा विहिताः प्रभो |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्यैष धर्मः स्यान्न राज्ञो राजसत्तम ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
व्राह्मणस्वं न हर्तव्यं पुरुषेण विजानता |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
व्राह्मणस्वं हृतं हन्ति नृगं व्राह्मणगौरिव ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
व्राह्मणस्वस्य चादानं त्रिविधस्ते व्यतिक्रमः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
राजो उवाच
व्राह्मणस्वादिहान्यत्र यत्किञ्चिद्वित्तमस्ति मे ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
व्राह्मणस्वानि चादत्ते व्राह्मणांश्च जिघांसति |
७६ क