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अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
व्राह्मणास्तात भुञ्जानास्त्रेताग्नीन्प्रीणय़न्तु ते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वासुदेव उवाच
व्राह्मणास्तात लोकेऽस्मिन्नर्चनीय़ाः सदा मम |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
व्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणास्तेऽन्वमोदन्त शिवेन कुशलेन च ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
व्राह्मणास्त्रिषु लोकेषु ये त्रिवर्गमनुष्ठिताः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणास्त्वां महावाहो भ्रातरश्च महौजसः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
व्राह्मणाय़ च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
व्राह्मणाय़ विशेषेण न स पापेन युज्यते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
व्राह्मणाय़ सदा देय़ं व्रह्म शुश्रूषवे भवेत् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
व्राह्मणाय़ सुरश्रेष्ठ कृशभृत्याय़ कश्चन ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
व्राह्मणाय़ातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्नुते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
व्राह्मणाय़ाभिरूपाय़ यो दद्यादन्नमर्थिने |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
व्राह्मणाय़ावगूर्येह स्पृष्ट्वा गुरुतरं भवेत् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
व्राह्मणी कपिला नाम काचिदासीत्कुटुम्विनी ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मणी क्षत्रिय़ा वैश्या शूद्रा च रतिमिच्छतः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
व्राह्मणी तु भवेज्ज्येष्ठा क्षत्रिय़ा क्षत्रिय़स्य तु |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
व्राह्मणी त्वेव तत्कुर्याद्व्राह्मणस्य युधिष्ठिर ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
व्राह्मणी व्राह्मणं कञ्चिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
व्राह्मणीं व्राह्मणं चैव मैथुनाय़ोपसङ्गतौ ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
व्राह्मणे कीदृशो धर्मः क्षत्रिय़े कीदृशो भवेत् |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणे दममव्यग्रं क्षत्रिय़े तेज उत्तमम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
व्राह्मणे दारुणं नास्ति मैत्रो व्राह्मण उच्यते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
व्राह्मणे नचिरादेव सुखमाय़ात्यनुत्तमम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
शक्र उवाच
व्राह्मणे सर्वभूतानां योगक्षेमः समाहितः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणेन तथा प्रोक्तं विदुषा साधुसंसदि |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणेन तपः कार्यं दानमध्ययनं तथा |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणेन तपो नूनं चरितं दुश्चरं महत् |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
व्राह्मणेन न वक्तव्यं तस्माद्वर्णावरे जने ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
व्राह्मणेन भवेच्चीर्णं व्रतं द्वादशवार्षिकम् |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
भीष्म उवाच
व्राह्मणेन यथाशक्त्या स्वकार्यमभिकाङ्क्षता ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेन वचस्तथ्यं तस्य कालोऽय़मागतः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
व्राह्मणेन विशेषेण व्राह्मणो ह्यग्निरुच्यते ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
व्राह्मणेन समागम्य तां वेद यदि मन्यसे ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
व्राह्मणेनानुगन्तव्या नान्यो विद्यात्कथञ्चन ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
व्राह्मणेभ्यः परं नास्ति पावनं दिवि चेह च |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
व्राह्मणेभ्यः परं नास्ति प्रेत्य चेह च भूतय़े ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५८
भीष्म उवाच
व्राह्मणेभ्यः प्रदाय़ाग्रं यः सुहृद्भिः सहाश्नुते |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मणेभ्यः प्रय़च्छन्ति दानानि विविधानि च |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
व्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थय़िष्यन्ति मां पथि ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि गाय़नेभ्यश्च सर्वशः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
व्राह्मणेभ्यश्च राजन्या लोकान्रक्षन्ति धर्मतः |
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यस्तदा राजन्दित्सन्तं वसु सर्वशः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यः सम्पतद्भ्यस्ततस्ततः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददद्ग्रामान्गाश्च राजन्सहस्रशः |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददौ चापि गय़श्चोर्वीं सपत्तनाम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददौ निष्कान्सदसि प्रतते नृपः |
११७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददौ राजा योऽश्वमेधे महामखे ||
१३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददौ रुक्मं वासांस्याभरणानि च ||
९३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं भूमिं ग्रामांश्च सर्वशः ||
५६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं यदुपाहरदच्युतः ||
३६ ख