chevron_left  व्राह्मणैस्तुarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणैस्तु प्रतिच्छन्नौ रौरवाजिनवासिभिः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणैस्ते च सहिताः पाण्डवाः समुपाविशन् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १६४
गन्धर्व उवाच
व्राह्मणो गुणवान्कश्चित्पुरोधाः प्रविमृश्यताम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
व्राह्मणो गुणवान्कश्चिद्धनेनोपनिमन्त्र्यताम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
व्राह्मणो गौतमः कश्चिन्मृदुर्दान्तो जितेन्द्रिय़ः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
व्राह्मणो जातमात्रस्तु पृथिवीमन्वजाय़त |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
व्राह्मणो जापकः कश्चिद्धर्मवृत्तो महाय़शाः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
व्राह्मणो धृतिमान्विद्वान्देवान्प्रीणाति तुष्टिमान् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
व्राह्मणो नाम भगवाञ्जन्मप्रभृति पूज्यते ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो नावमन्तव्यः सद्वासद्वा समाचरन् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
भीष्म उवाच
व्राह्मणो भरतश्रेष्ठ स्वधर्मं वेद मेधय़ा ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो भार्गवोऽस्मीति गौरवेणाभ्यगच्छत ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
व्राह्मणो मध्यदेशीय़ः कृष्णाङ्गो व्रह्मवर्जितः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो मन्त्रकुशलः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो यदि वा वाल्याल्लोभाद्वा कृतवानिदम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मणो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
व्राह्मणो रुषितो हन्यादपि लोकान्प्रतिज्ञय़ा ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो वहुभोक्तास्मि भुञ्जेऽपरिमितं सदा |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मणो वा च्युतो धर्माद्यथा शूद्रत्वमाप्नुते ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मणो वाथ वा राजा तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मणो वाप्यसद्वृत्तः सर्वसङ्करभोजनः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो वेदविद्भूत्वा सूर्यो योगाद्धि रूपवान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मणो वैश्यधर्मेण वर्तय़न्भरतर्षभ ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
व्राह्मणो व्राह्मणं वेद भर्ता वेद स्त्रिय़ं तथा |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
व्राह्मणो व्राह्मणैः श्राव्यो राजन्यः क्षत्रिय़ैस्तथा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
व्राह्मणो हि कुले जातः कृतप्रज्ञो विनीतवाक् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मणो हि महत्क्षेत्रं लोके चरति पादवत् |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
व्राह्मणो हि महद्भूतं क्षेत्रं चरति पादवत् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
व्राह्मणो हि महद्भूतं स्वय़ं देहीति याचते |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
व्राह्मणो हि महद्भूतमस्मिँल्लोके परत्र च |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
व्राह्मणो ह्यनधीय़ानस्तृणाग्निरिव शाम्यति |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
व्राह्मणो ह्याशय़ा पूर्वं कृतय़ा पृथिवीपते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
व्राह्मणोक्तेन विधिना दृष्टान्तागमहेतुभिः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
व्राह्मणोऽपि जपन्नास्ते दिव्यं वर्षशतं तदा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
व्राह्मणोऽपि यथान्याय़ं गुरुवृत्तिमनुत्तमाम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
१९ ग
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यस्पर्धिनौ भृशम् ||
६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
व्राह्मण्यं काङ्क्षसे हि त्वं तपश्च पृथिवीपते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
मतङ्ग उवाच
व्राह्मण्यं कामय़ानोऽहमिदमारव्धवांस्तपः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यं तात दुष्प्रापं वर्णैः क्षत्रादिभिस्त्रिभिः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मण्यं दुर्लभं प्राप्य करोत्यल्पमतिः सदा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यं दुर्लभं लोके राज्यं हि सुलभं नरैः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मण्यं देवि दुष्प्रापं निसर्गाद्व्राह्मणः शुभे |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मण्यं पुण्यमुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृशः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मण्यं प्राप्नुय़ात्केन तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
मतङ्ग उवाच
व्राह्मण्यं प्रार्थय़ानस्त्वमप्राप्यमकृतात्मभिः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
व्राह्मण्यं मे कुलस्यास्तु भगवन्नेष मे वरः ||
३४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
मतङ्ग उवाच
व्राह्मण्यं यदि दुष्प्रापं त्रिभिर्वर्णैः शतक्रतो |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मण्यं यदि दुष्प्रापं त्रिभिर्वर्णैर्नराधिप |
१ क