अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
मतङ्ग उवाच
व्राह्मण्यं योऽवजानीते धनं लव्ध्वेव दुर्लभम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यं लभते जन्तुस्तत्पुत्र परिपालय़ ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मण्यं लव्धवांस्तत्र विश्वामित्रो महामुनिः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मण्यं लव्धवान्यत्र विश्वामित्रो महामुनिः |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यं वहुभिरवाप्यते तपोभि; स्तल्लव्ध्वा न परिपणेन हेडितव्यम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मण्यमथ चेदिच्छेत्तन्मे व्रूहि पितामह ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मण्यमेव सम्प्राप्य रक्षितव्यं यतात्मभिः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यां क्षत्रिय़ाय़ां च क्षत्रिय़स्यैक एव तु ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यां लक्ष्यते सूत इत्येतेऽपसदाः स्मृताः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
मतङ्ग उवाच
व्राह्मण्यां वृषलाज्जातं पितर्वेदय़तीह माम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
गर्दभ्यु उवाच
व्राह्मण्यां वृषलेन त्वं मत्ताय़ां नापितेन ह |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
व्राह्मण्यां व्राह्मणाज्जातो व्राह्मणः स्यान्न संशय़ः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यां सम्प्रजाय़न्त इत्येते कुलपांसनाः |
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
व्राह्मण्याः प्रथमः पुत्रो भूय़ान्स्याद्राजसत्तम |
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
व्राह्मण्याः सदृशः पुत्रः क्षत्रिय़ाय़ाश्च यो भवेत् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
व्राह्मण्यात्स परिभ्रष्टः क्षत्रय़ोनौ प्रजाय़ते ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यास्तद्धरेत्कन्या यथा पुत्रस्तथा हि सा |
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यास्तद्धरेत्पुत्र एकांशं वै पितुर्धनात् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
व्राह्मण्ये सति चर्षित्वमृषित्वे च तपस्विता ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
व्राह्मण्यै तानि देय़ानि भर्तुः सा हि गरीय़सी ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मण्यो राजपुत्र्यश्च विशां दुहितरश्च याः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
व्राह्ममार्गमतिक्रम्य वर्तितव्यं वुभूषता ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
व्राह्ममुच्चारय़ंस्तेजो हुताहुतिरिवानलः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
व्राह्मश्च वेदकामानां ज्याघोषश्च धनुर्भृताम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
व्राह्मान्नाराय़णादैन्द्रादाग्नेय़ादपि वारुणात् |
१२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
व्राह्मी सुदुर्लभा श्रीर्हि प्रज्ञाहीनेन क्षत्रिय़ ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
कच उवाच
व्राह्मीं माय़ामासुरी चैव माय़ा; त्वय़ि स्थिते कथमेवातिवर्तेत् ||
४३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
व्राह्मीं श्रिय़ं सुविपुलां विभ्रद्देवर्षिसत्तमः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
विदुर उवाच
व्राह्मीं हि योनिमापन्नः सुगुह्यमपि यो वदेत् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मे धनुषि चाचार्यं वेदय़ोरन्तरं द्वय़ोः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मे पौरन्दरे चास्त्रे निष्ठितो गुरुशासनात् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
व्राह्मे मुहूर्ते वुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तय़ेत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
व्राह्मे रात्रिक्षय़े प्राप्ते तस्य ह्यमिततेजसः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मे वले भवान्युक्तः स्वाध्याय़े यज्ञकर्मणि ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मे वले स्थितो ह्येष न क्षत्रेऽतिवले विभो ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
व्राह्मे वेदे तथेष्वस्त्रे यमुपासन्गुणार्थिनः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मेण वपुषा युक्ता युक्ता मुनिगणैश्च ताः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
व्राह्मेणास्त्रेण चास्त्राणि हन्यमानानि संय़ुगे |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
व्राह्मेणैव महावाहुराहवे समुदीरितम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
व्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्म्या श्रिय़ा दीप्यमानं पिङ्गलं जटिलं कृशम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
कुन्त्यु उवाच
व्राह्म्या श्रिय़ा दीप्यमानं साधुवादेन संमतम् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
व्राह्म्या श्रिय़ा दीप्यमाना शुशुभे विगतक्लमा ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्म्या श्रिय़ा दीप्यमानान्स्थितानुभय़तः पथि ||
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
व्रिय़तां च वरः पार्थ किमस्मत्तोऽभिकाङ्क्षसि |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
व्रिय़तामात्मनः श्रेय़स्तत्सर्वं प्रददानि वाम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
व्रिय़न्तामीप्सिता भोगाः परिहार्याश्च पुष्कलाः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
व्रिय़माणे तथा पौत्रे पुत्रे च निधनं गते ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
व्रीडन्निव जगामाथ युधिष्ठिररथं प्रति ||
९६ ख