chevron_left  समन्तात्प्रत्यवाश्यन्तarrow_drop_down
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
समन्तात्प्रत्यवाश्यन्त रासभा दारुणस्वराः ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
समन्तात्सम्परिक्षिप्तं मृत्योरपि भय़प्रदम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
समन्तात्सर्वभूतानां न तदत्येति कश्चन ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
समन्ताद्द्रावय़न्द्रोणो वह्वशोभत मारिष ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
समन्ताद्भय़ उत्पन्ने कथं कार्यं हितैषिणा ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
समन्तान्निशितान्वाणान्विमुञ्चन्तो जय़ैषिणः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
समन्त्रं सोपचारं च समोक्षं सनिवर्तनम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
समन्युरव्रवीद्राजन्दुर्योधनमिदं वचः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
समन्युरुत्थाय़ महानुभाव; स्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षुः |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
समन्वधावन्पुनरुच्छ्रितैर्ध्वजै; रथैः सुय़ुक्तैरपरे युय़ुत्सवः ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
समन्वितः पार्वतीय़ैः शक्रो देवगणैरिव ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
समन्वितः स्वधिष्ठानः सम्यक्पचति पावकः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्पचति पावकः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भारत |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
समपद्यत चार्काभे भारद्वाजनिशाकरे ||
४० ग
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
समपद्यत सर्वेषां सैन्यानां सुमहद्भय़म् ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
समपर्यन्महावेगाञ्श्वसमानानिवोरगान् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
समपोवाह हार्दिक्यं स्वरथेन युधिष्ठिरात् ||
८३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
समप्रमाणान्पाण्डूनां समवीर्यान्मदोत्कटान् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावंस्त्वरिताः कौरवाणां महारथाः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावंस्त्वरिताश्चित्रकार्मुकधारिणः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावत्त्वरितः पाञ्चालाञ्शत्रुकर्शनः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावन्क्रोशन्तो राजानं जातसम्भ्रमाः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावन्त भृशं देवा दण्डैरिवोद्यतैः |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावन्नस्यन्तो विविधं क्षिप्रमाय़ुधम् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावन्राधेय़ं जिघांसन्तः प्रहारिणः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
समभ्यधावन्सहसा भारद्वाजं युय़ुत्सवः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
समभ्ययादुग्रतेजाः शरैश्चाभ्यहनद्वली ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
समभ्ययुः शान्तनवं भूतानीव तमोनुदम् ||
३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
समभ्याशगतस्याजौ तस्य खड्गेन दुर्मतेः |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
समभ्युदीर्णांश्च तवात्मजांस्तथा; निशाम्य वीरानभितः स्थितान्रणे |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
समभ्युद्धरमाणस्य दीक्षाश्रमपदं भवेत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
सममस्तु सहैवास्तु प्रतिगृह्णातु वै भवान् ||
११३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
द्रोण उवाच
सममाचार्यकं तात तव चैवार्जुनस्य च |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
सममाचार्यकं तात तव तेषां च मे सदा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सममेति विवक्षाय़ां तदा सोऽर्थः प्रकाशते ||
९१ ख
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
सममेतेन युध्यस्व वाहुभ्यां भरतर्षभ ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
समरश्लाघिनौ वीरौ समरेष्वपलाय़िनौ |
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
समरे चित्रय़ोधी च दृढास्त्रश्च महारथः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
समरे तमनादृत्य नास्य वीर्यमचिन्तय़त् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
समरे दुष्करं कर्म कुर्वाणं परिरक्षतु ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
समरे नातिवर्तन्ते वेलामिव महार्णवः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
समरे नाशय़ेच्छत्रूनमोघो नाम पावकः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैशम्पाय़न उवाच
समरे निहतास्तस्मात्सर्वे मणिमता सह ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
समरे पतितैश्चैव शक्त्यृष्टिशरतोमरैः |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
समरे पाण्डवेय़ानां सङ्क्रुद्धो ह्यभिधावताम् |
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
समरे पातय़िष्यामि स्वय़मेव भृगूद्वह ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
समरे वा भवेन्मृत्युर्वने वा विधिपूर्वकम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
समरे वालिसुग्रीवौ शालतालशिलाय़ुधौ ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
समरे शत्रुदुर्धर्षमभिमन्युमपीडय़त् ||
२७ ख