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वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रूहि किं ते करोम्यत्र साहाय़्यं पुरुषर्षभ |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
व्रूहि किं ते करोम्यद्य कामं कं त्वमिहेच्छसि ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
शल्य उवाच
व्रूहि किमत्र साह्यं ते करोमि नृपसत्तम |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
व्रूहि कृष्ण यथातत्त्वं त्वं हि प्राज्ञतमः सदा |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
उत्तङ्क उवाच
व्रूहि केशव तत्त्वेन त्वमध्यात्ममनिन्दितम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
व्रूहि क्षिप्रं महाभागे वध्यतां केन हेतुना ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
व्रूहि गालव गच्छावो वुद्धिः का द्विजसत्तम ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
व्रूहि गालव यास्यामि शृणु चाप्यपरां दिशम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
व्रूहि गावल्गणे सर्वं राहोः सोमार्कय़ोस्तथा ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
शल्य उवाच
व्रूहि चैव परं वीर केनार्थः किं ददामि ते |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
व्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशय़ो मे महानय़म् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
कर्ण उवाच
व्रूहि तत्पुरुषव्याघ्र त्वं हि प्राज्ञतमो नृप |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
युधिष्ठिर उवाच
व्रूहि तस्मादुपाय़ं नो यथा युद्धे जय़ेमहि |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
व्यास उवाच
व्रूहि तावन्महाप्राज्ञ शुश्रूषे वचनं तव ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
शृङ्ग्यु उवाच
व्रूहि त्वं कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो वलम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
व्रूहि त्वं नृपतिश्रेष्ठ तपसा साधय़ामि किम् ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
व्रूहि दास्यामि राजेन्द्र विभवे सति माचिरम् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ केनार्थः किं ददामि ते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
युधिष्ठिर उवाच
व्रूहि धर्मान्सुखोपाय़ान्मद्विधानां सुखावहान् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
युधिष्ठिर उवाच
व्रूहि पुत्रान्कुरुश्रेष्ठ वर्णानां त्वं पृथक्पृथक् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
धृतराष्ट्र उवाच
व्रूहि भूय़ो महावुद्धे धर्मार्थसहितं वचः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
व्रूहि मद्वचनाद्दूत पाञ्चाल्यं तं नृपाधमम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
व्रूहि मे यदि गन्तव्यं प्रतीचीं शृणु वा मम ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
व्रूहि मे सुमहाप्राज्ञ ददाम्याचार्यवेतनम् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
राम उवाच
व्रूहि यत्ते मनोदुःखं करिष्ये वचनं तव ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
व्रूहि यादवशार्दूल यानिच्छसि सुदुर्लभान् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
व्रूहि रासभि कल्याणि माता मे येन दूषिता |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १८
विनतो उवाच
व्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततोऽत्र विपणावहे ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
व्रूहि वा त्वं यथा स्वैरं करवाणि किमित्युत ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
व्रूहि वा त्वं यय़ा धृत्या शूर त्यजसि सङ्गरम् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
सौदास उवाच
व्रूहि विप्र यथाकामं प्रतिवक्तास्मि ते वचः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
युधिष्ठिर उवाच
व्रूहि व्राह्मणपूजाय़ां व्युष्टिं त्वं मधुसूदन |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
व्रूहि शुल्कं द्विजश्रेष्ठ समीक्ष्य विभवं मम ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूहि सञ्जय़ तत्त्वेन पुनरुक्तां कथामिमाम् ||
१२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूहि सञ्जय़ यच्छेषं वासुदेवादनन्तरम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
व्रूहि सर्प यथाकामं प्रतिवक्ष्यामि ते वचः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
व्रूहि सर्वं करिष्यामि यन्मां त्वं वक्ष्यसि द्विज ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूहि सर्वं यथातत्त्वं भरतानां महाक्षय़म् |
६२ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
व्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
व्रूहीदानीं सुसंरव्धः पुनर्गौरिति गौरिति ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
व्रूह्यस्मै दानवेन्द्राय़ विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
व्रूय़ा माधव कल्याणीं कृष्णां कृष्ण यशस्विनीम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूय़ा माधव राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् |
७२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
व्रूय़ाः कर्ण इतो गत्वा द्रोणं शान्तनवं कृपम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
व्रूय़ाः केशव राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
व्रूय़ाः सञ्जय़ राजानं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
व्रूय़ाच्च मा प्रवृणीष्वेति लोके; युद्धेऽद्वितीय़ं सचिवं रथस्थम् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
व्रूय़ाच्छ्राद्धे च सावित्रीं पिण्डे पिण्डे समाहितः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूय़ादप्रतिरूपाणि यथा मां वक्तुमर्हसि ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
व्रूय़ादहं वो राजेति रक्षिष्यामि च वः सदा ||
२ ख